भागवत जी का ‘विदेशी’ सेक्युलरिज्म और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का भारी दुख!

वाह! जब-जब हमारे देश के परम आदरणीय मार्गदर्शक सात समंदर पार जाते हैं, तो उनके भीतर का ‘वसुधैव कुटुंबकम’ ऐसा हिलोरे मारता है कि न्यूयॉर्क और वाशिंगटन की सड़कों पर सेक्युलरिज्म की खुशबू आने लगती है। संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने अमेरिका में जाकर जो कहा, उसने हमारे देसी भक्तों की रातों की नींद और सोशल मीडिया का चैन छीन लिया है। भागवत जी ने फरमाया, “जो हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, वह हिंदू ही नहीं है।”

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के शूरवीरों का विलाप

अब जरा उन बेचारे ‘कीबोर्ड वॉरियर्स’ और स्वघोषित ‘धर्म-रक्षकों’ की हालत की कल्पना कीजिए, जो सुबह की चाय से लेकर रात के डिनर तक, फेसबुक और व्हाट्सएप पर ‘खतरे में है’ का अलार्म बजाते हैं। वे कल तक जिन्हें ‘बाहरी’ बताकर देश से बाहर भेजने का वीजा तैयार कर रहे थे, आज उनके सबसे बड़े संगठन के मुखिया ने ही उन्हें हिंदू होने के सर्टिफिकेट से बेदखल कर दिया! यह तो वही बात हुई कि छात्र पूरी रात परीक्षा की तैयारी ‘नफरत’ के सिलेबस से करे और सुबह पेपर ‘मोहब्बत’ का आ जाए। बेचारे ट्रोलर्स अब सोच रहे होंगे कि अब कीबोर्ड पर उंगलियां कैसे चलाएं? क्या अब उन्हें भी अपने ही ‘सॉफ्टवेयर’ को अपडेट करना पड़ेगा?

विदेशी हवा का ‘धर्मनिरपेक्ष’ असर

यह अद्भुत चमत्कार अक्सर देखा गया है। भारत में रहते हुए ‘डीएनए’ वाली थ्योरी समझाई जाती है, कभी ‘घर वापसी’ पर चर्चा होती है, तो कभी खान-पान पर गर्मागर्म बहसें। लेकिन जैसे ही विमान अमेरिका की सीमा में प्रवेश करता है, सारा कड़वा सच अचानक ‘अध्यात्म और सह-अस्तित्व’ की मीठी चाशनी में बदल जाता है। शायद वहां की हवा में कुछ ऐसा है जो हमारे विचारकों को अचानक ‘गांधी’ और ‘विवेकानंद’ की याद दिला देता है। वैसे भी, गोरे साहबों के सामने खुद को ‘उदारवादी’ दिखाना एक पुरानी भारतीय परंपरा है।

काक-वाणी की अंतिम सलाह

‘काक-वाणी’ का मानना है कि भागवत जी के इस बयान के बाद देश के सभी नफरती चिंटुओं को कुछ दिनों के लिए मौन व्रत धारण कर लेना चाहिए। बेचारे दिन-रात मेहनत करके ध्रुवीकरण की जिस फसल को सींच रहे थे, उस पर खुद उनके मुखिया ने ही ‘प्रेम का पानी’ फेर दिया। लेकिन घबराइए मत, यह अमेरिकी ज्ञान केवल विदेश यात्रा तक ही सीमित रहेगा। जैसे ही विमान दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरेगा, स्वदेशी नैरेटिव और लोकल नेता फिर से आपको ‘असली वाला’ काम सौंप देंगे। तब तक के लिए, थोड़ा ‘सहिष्णु’ होने का नाटक कर लीजिए, वैसे भी नाटक करने में हमारा कोई सानी नहीं है!


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कागा जी