भूतकाल की चाशनी में डूबा भविष्य: युवाओं को नौकरी नहीं, ‘इतिहास’ का हलवा चाहिए!

कौआ कान ले गया! जी हां, ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है। आज हम उस महान राजनीतिक दर्शन पर चर्चा करेंगे जो मानता है कि देश का युवा भविष्य की तरफ नहीं, बल्कि पांच सौ साल पीछे मुड़कर देखना चाहता है। हाल ही में एक गंभीर अखबार ने लिखा कि जो राजनीति इतिहास की खुदाई में व्यस्त है, वह भविष्य की ओर देखने वाले युवाओं को पसंद नहीं आ रही। अरे भाई, इस लिखने वाले को देश की असली समझ ही नहीं है!

इतिहास की खुदाई में छुपा है रोजगार का ‘खजाना’

हमारे भारतीय राजनेता इस बात को भली-भांति जानते हैं कि युवाओं को नौकरी, स्टार्टअप या बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई जरूरत नहीं है। भला चैट-जीपीटी (ChatGPT) और एआई (AI) से किसका पेट भरा है? असली आनंद तो इस बात की चर्चा में है कि औरंगजेब ने किस मंदिर को तोड़ा था और अकबर ने महाराणा प्रताप से कौन सी संधि की थी। हमारे दूरदर्शी नेता रात-दिन जागकर इतिहास की धूल झाड़ रहे हैं ताकि आज के डिग्रीधारी युवा सड़कों पर बेरोजगारी भत्ता मांगते समय यह गर्व महसूस कर सकें कि उनका भूतकाल कितना महान था।

रिफॉर्म्स बनाम ‘रिफॉर्मिंग हिस्ट्री’

आज का युवा भी कितना नासमझ है! वह चाहता है कि देश में सेमीकंडक्टर प्लांट लगें, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हों और शिक्षा का स्तर सुधरे। लेकिन हमारे परम आदरणीय राजनेता जानते हैं कि असली विकास तो सड़कों के गड्ढे भरने में नहीं, बल्कि ‘इतिहास के गड्ढे’ भरने में है। किसी पुराने शहर का नाम बदल देने से जो अलौकिक तृप्ति मिलती है, वह भला नए कॉलेजों के निर्माण से कहां मिल सकती है? जब युवा भविष्य की ओर देखता है, तो नेताजी उसे दूरबीन देकर पीछे देखने को कहते हैं। पीछे देखो, वहां कितनी लड़ाइयां अधूरी रह गई थीं, उन्हें फेसबुक और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के कमेंट बॉक्स में लड़कर पूरा करो!

भविष्य अंधकारमय है, इसलिए भूतकाल ही सहारा है

अंततः, ‘काक-वाणी’ का निष्कर्ष यही है कि युवाओं को अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए। भविष्य का क्या है, वह तो अनिश्चित है, लेकिन भूतकाल एकदम सुरक्षित और पका-पकाया है। जब तक हमारे पास कोसने के लिए पुराने नेता, गाली देने के लिए इतिहास के खलनायक और श्रेय लेने के लिए सदियों पुराने आविष्कार मौजूद हैं, तब तक युवाओं को रोजगार की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आइए, हम सब मिलकर इतिहास के पन्नों को पलटें, क्योंकि भविष्य की किताबें पढ़ना वैसे भी हमारे नेताओं के सिलेबस से बाहर है!


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कागा जी