बहुत समय पहले की बात है, गंगा किनारे बसे एक छोटे से गाँव में दीनदयाल नाम का एक वृद्ध कुम्हार रहता था। दीनदयाल केवल मिट्टी के बर्तन ही नहीं बनाता था, बल्कि वह मिट्टी में अपनी आत्मा फूंक देता था। उसके बनाए खिलौने और मूर्तियां इतनी सजीव होती थीं कि देखने वाले दंग रह जाते थे। लेकिन दीनदयाल अंधा था। वह केवल अपनी उंगलियों के स्पर्श से ही मिट्टी को अद्भुत आकार देता था।
एक अनोखा खिलौना और गहरा लगाव
दीनदयाल का एक छोटा पोता था, जिसका नाम माधव था। माधव के माता-पिता बचपन में ही एक महामारी की भेंट चढ़ गए थे। दीनदयाल ने माधव का अकेलापन दूर करने के लिए अपने हाथों से एक बहुत ही सुंदर मिट्टी का हिरण बनाया था। वह हिरण इतना सुंदर और सजीव था कि माधव उसे हमेशा अपने सीने से लगाकर रखता था। वह उसे केवल एक खिलौना नहीं, बल्कि अपना सबसे सच्चा मित्र समझता था।
एक शाम, गाँव में अचानक बहुत तेज आंधी-तूफान आया। हर तरफ धूल उड़ने लगी और लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। इसी अफरा-तफरी में माधव के हाथ से वह मिट्टी का हिरण छूटकर पक्के फर्श पर गिर गया और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। आंधी शांत होने पर जब माधव ने अपने प्यारे हिरण को टूटा हुआ देखा, तो उसका दिल बैठ गया। वह फूट-फूटकर रोने लगा, “दादाजी, मेरा दोस्त टूट गया! अब मैं किसके साथ खेलूँगा?”
दादाजी का जीवन मंत्र
अंधे दादाजी ने माधव के रोने की आवाज सुनी। उन्होंने टटोलते हुए उसे अपने पास बुलाया, उसके आंसू पोंछे और अपनी गोद में बिठा लिया। उन्होंने जमीन पर बिखरे मिट्टी के टुकड़ों को समेटा और माधव की नन्हीं हथेलियों पर रख दिया।
दीनदयाल ने बड़े ही शांत और भावुक स्वर में कहा, “बेटा माधव, रो मत। इस बिखरी हुई मिट्टी को ध्यान से छुओ। क्या तुम्हें इसमें अभी भी वही हिरण महसूस हो रहा है?”
माधव ने सिसकते हुए कहा, “नहीं दादाजी, यह तो अब सिर्फ बेजान और बिखरी हुई मिट्टी के टुकड़े हैं।”
दीनदयाल ने गहरी सांस ली और कहा, “यही तो जीवन का सबसे बड़ा सच है, मेरे बच्चे। जिसे तुम हिरण समझकर छाती से लगाए थे, वह वास्तव में केवल मिट्टी थी जिसे कुछ समय के लिए एक सुंदर रूप मिला था। आज समय के एक झोंके ने उसका वह रूप छीन लिया, लेकिन मूल मिट्टी आज भी वहीं की वहीं है। मैं भी इस बूढ़े मिट्टी के बर्तन की तरह हूँ, जो कभी भी टूट सकता है। लेकिन क्या मेरे टूटने के बाद तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम समाप्त हो जाएगा?”
मिट्टी से मिला जीवन का परम सत्य
माधव ने अपनी नासमझ आँखों से दादाजी की तरफ देखा। दीनदयाल ने आगे समझाया, “हमारा यह शरीर भी इस मिट्टी के खिलौने की तरह ही है। ईश्वर ने हमें पंचतत्वों की मिट्टी से गढ़ा है और एक दिन हमें इसी मिट्टी में मिल जाना है। जो इस संसार में आया है, उसका जाना निश्चित है। असली सच यह खिलौना नहीं था, बल्कि वह प्रेम था जो तुमने इसके साथ महसूस किया। रूप बदलते रहते हैं, लेकिन भावनाएं और आत्मा अमर रहती हैं।”
दादाजी की इस बात ने सात साल के माधव के कोमल मन को एक अनूठी शांति दी। उसने रोना बंद कर दिया और समझ गया कि संसार की हर सुंदर वस्तु नश्वर है, केवल हमारी अच्छी यादें ही शाश्वत हैं।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
सीख: यह लोककथा हमें सिखाती है कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। धन, रूप, वैभव और हमारा यह शरीर सब क्षणभंगुर हैं। इसलिए, हमें बाहरी रूपों और भौतिक चीजों से अत्यधिक मोह करने के बजाय, जीवन के हर क्षण को प्रेम से जीना चाहिए और अपनों का सम्मान करना चाहिए।