भारत में संस्कृति का संकट अचानक इतना गहरा गया है कि अब इस पर विदेशी मीडिया को भी अपनी स्याही खर्च करनी पड़ रही है। वाकया यह है कि एक प्रदर्शन के दौरान कुछ महिलाओं ने थोड़े ‘असंस्कारी’ यानी गाली-गलौज वाले शब्दों का प्रयोग कर लिया। अब इस बात पर हमारे परम आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को ऐसा ‘कल्चर शॉक’ लगा, मानो उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार कोई अपशब्द सुना हो। उधर, विपक्ष के सेनापति राहुल गांधी इस ‘शॉक’ का शॉर्ट-सर्किट करने के लिए तुरंत मैदान में उतर आए हैं।
मोदी जी के कोमल कान और संस्कृति की अचानक आई याद
काक-वाणी के प्रिय पाठकों, आपको समझना होगा कि हमारे प्रधानमंत्री जी के कान कितने संवेदनशील हैं। जब चुनावी रैलियों में उनके अपने सिपहसालार विरोधियों को ‘दीदी ओ दीदी’ कहकर हुंकार भरते हैं या मंचों से ‘शमशान-कब्रिस्तान’ की बातें होती हैं, तब तो प्रधानमंत्री जी के कानों में जैसे मधुर संगीत बजता है। लेकिन जैसे ही एक प्रदर्शन में कुछ महिलाओं के मुंह से कड़वे बोल निकले, प्रधानमंत्री जी की ‘सांस्कृतिक आत्मा’ तड़प उठी। मोदी जी को अचानक लगा कि हाय! हमारी हजारों साल पुरानी संस्कृति इन चंद अपशब्दों से मटियामेट हो गई। जनता हैरान है कि जो नेता देश के बड़े-बड़े मुद्दों पर अडिग और मौन रहता है, वह महिलाओं की कुछ गालियों से इतना विचलित कैसे हो गया?
राहुल गांधी की ‘मोहब्बत की दुकान’ में गालियों का स्वागत!
अब इस खेल में राहुल गांधी कैसे पीछे रहते? उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री जी के इस ‘कल्चर शॉक’ का मजाक उड़ाते हुए पूछ लिया कि भाई, असली मुद्दों पर आपका शॉक कहां चला जाता है? राहुल जी का मानना है कि लोकतंत्र में अगर जनता को गुस्सा जाहिर करने और थोड़े ‘तीखे’ शब्दों का इस्तेमाल करने की आजादी नहीं होगी, तो भला लोकतंत्र बचेगा कैसे? आखिर ‘मोहब्बत की दुकान’ में कभी-कभी थोड़ी कड़वी जुबान बेचना भी तो जायज होना चाहिए! राहुल गांधी ने तंज कसा कि देश में बेरोजगारी, महंगाई और मणिपुर की हिंसा पर तो प्रधानमंत्री जी को कोई शॉक नहीं लगता, लेकिन महिलाओं के मुंह से निकले दो तीखे बोलों पर उनके अंदर का संस्कारी बाबू जाग जाता है।
शॉक और ढोंग का यह खेल हमेशा जारी रहेगा
इस पूरी नूराकुश्ती में जनता हमेशा की तरह मूकदर्शक बनी हुई है। एक तरफ वो सत्ता पक्ष है जो चाहता है कि महिलाएं केवल थाली बजाएं और सरकार की आरती गाएं। दूसरी तरफ वो विपक्ष है जो गालियों में भी ‘लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति’ का सौंदर्य ढूंढ रहा है। काक-वाणी तो बस यही कह सकती है कि जब तक राजनीति में यह ‘शॉक’ और ‘संस्कृति’ का पाखंड चलता रहेगा, तब तक देश के असली मुद्दों पर सन्नाटा पसरा रहेगा और नेता अपनी सुविधानुसार ‘संस्कारी’ और ‘क्रांतिकारी’ बनते रहेंगे।
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