रील्स, रायता और क्रांति: कैसे हमारा ‘जेन-जी’ ला रहा है भारतीय राजनीति में ‘एस्थेटिक’ बदलाव!

वाह! एनडीटीवी की इस विशेष रिपोर्ट को देखकर हमारी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। देश का ‘जेन-जी’ (Gen-Z) अब राजनीति बदल रहा है। अब तक हम सोचते थे कि हमारे देश के नौजवान केवल इंस्टाग्राम रील्स पर अजीबोगरीब डांस करने और स्टारबक्स में बैठकर देश की गरीबी पर ‘गहन’ चर्चा करने में व्यस्त हैं। लेकिन हमारी सोच कितनी पिछड़ी थी! हमारे ये नौजवान तो चुपके-चुपके लोकतंत्र की दशा और दिशा सुधार रहे थे। धन्य हो यह ‘क्रांतिकारी’ पीढ़ी!

नारेबाजी से ‘एस्थेटिक रील्स’ तक का क्रांतिकारी सफर

पहले के जमाने में राजनीति में आने के लिए जमीन पर धूल फांकनी पड़ती थी, तपती धूप में रैलियों में दरी बिछानी पड़ती थी और कभी-कभी पुलिस के डंडे भी खाने पड़ते थे। लेकिन हमारे ‘जेन-जी’ युवाओं ने इस थकाऊ और घिसी-पिटी प्रक्रिया को बेहद ‘एस्थेटिक’ बना दिया है। अब क्रांति के लिए पसीना बहाने की जरूरत नहीं है; बस एक बढ़िया पेस्टल-कलर बैकग्राउंड, थोड़ा सा स्लो-मोशन इफेक्ट और बैकग्राउंड में कोई स्वैग वाला रैप म्यूजिक चाहिए। बस, हो गया राजनीतिक बदलाव!

सोशल मीडिया पर ‘सिचुएशनशिप’ और ‘एंग्जायटी’ से जूझने वाले ये युवा अब देश की ‘पॉलिटिकल सिचुएशन’ संभाल रहे हैं। इनका सीधा सा मंत्र है—अगर सरकार की कोई नीति पसंद न आए, तो उसे सीधे सोशल मीडिया पर ‘कैंसल’ कर दो। ट्विटर (अब एक्स) पर ‘हैशटैग’ चलाकर जो सरकारें गिराई जा रही हैं, उसे देखकर पुराने जमाने के स्वतंत्रता सेनानी स्वर्ग में बैठकर निश्चित ही अपनी रणनीतियों पर पछता रहे होंगे।

बूढ़े नेताओं का ‘कूल’ अवतार और रील्स का रायता

इस नई लहर का सबसे मजेदार असर हमारे पुराने, सफेद खादी वाले युवा नेता (जो साठ की उम्र पार करने के बाद भी पार्टी के ‘युवा विंग’ के अध्यक्ष बने बैठे हैं) पर दिख रहा है। अब वे भी चुनाव प्रचार में नीतिगत और उबाऊ भाषण देने के बजाय मशहूर यूट्यूबर्स के साथ पोडकास्ट कर रहे हैं, रैप गानों पर थिरक रहे हैं और कैमरे के सामने ‘मोमोज’ खाते नजर आ रहे हैं। आखिर वोट चाहिए तो ‘जेन-जी’ की भाषा में ‘वाइब’ तो मैच करनी ही पड़ेगी ना!

अब संसद में दिए गए गंभीर भाषणों से ज्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि किस नेता का ‘सिग्मा मेल’ वाला एडिट वीडियो सबसे ज्यादा वायरल हो रहा है। देश का भविष्य अब जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम के ‘लाइक्स’ और ‘शेयर्स’ की संख्या से तय हो रहा है।

निष्कर्ष: नया पैकेट, वही पुराना माल

‘काक-वाणी’ का मानना है कि इस डिजिटल क्रांति से देश में भारी बदलाव आने वाला है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे अब बहुत पुराने और आउटडेटेड हो चुके हैं; असली जंग तो कमेंट सेक्शन में ‘कीबोर्ड वॉरियर्स’ के बीच लड़ी जा रही है। भले ही जमीन पर बुनियादी समस्याएं जस की तस रहें, लेकिन कम से कम अब हमारा राजनीतिक प्रोपेगैंडा बहुत ही ‘आई-कैची’ और रंग-बिरंगा हो गया है। तो चलिए, इस ‘क्रांति’ को लाइक कीजिए, कमेंट में ‘अग्री’ लिखिए और इस चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा!


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कागा जी