वाह! क्या खबर छापी है जापान के ‘निकेई एशिया’ ने। उनकी दूरबीन इतनी ताकतवर है कि टोक्यो में बैठे-बैठे उन्हें दिल्ली के सत्ता गलियारों में ‘भूकंप’ महसूस हो रहा है। विदेशी पत्रकारों को लगता है कि भारत में विपक्ष के धरने-प्रदर्शनों ने मोदी सरकार की नींद उड़ा दी है। अब इसे कहते हैं ‘ग्लोबल विजन’! हमारे देश के विपक्ष को खुद सुबह तक नहीं पता होता कि वे दोपहर में किस मुद्दे पर धरना देने वाले हैं, लेकिन विदेश में बैठे बुद्धिजीवियों को उनके कदमों में ‘क्रांति की आहट’ सुनाई दे जाती है।
जब टोक्यो की दूरबीन से दिखा दिल्ली का ‘डर’
रिपोर्ट कहती है कि विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों ने सरकार पर भारी दबाव बना दिया है। सचमुच, यह दबाव इतना भयानक है कि सरकार के सिपहसालार रात को सो नहीं पा रहे होंगे—शायद अगली चुनावी रैलियों का नक्शा बनाने में व्यस्तता के कारण! विपक्षी नेताओं के इस ‘महा-दबाव’ का असर देखिए कि जब वे संसद के बाहर हाथ में तख्तियां लेकर मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं, तो सरकार के चेहरे पर ‘डर’ के मारे हंसी छूट जाती है। इस ‘I.N.D.I.A.’ गठबंधन की एकजुटता इतनी मजबूत है कि एक नेता चाय पीने जाता है तो दूसरा जूस पीने। लेकिन जब ये सब मिलकर एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, तो विदेशी मीडिया को लगता है कि दिल्ली का सिंहासन हिल रहा है।
संसद से सड़क तक ‘चाय-समोसा’ क्रांति
भारतीय विपक्ष का आंदोलन भी किसी त्यौहार से कम नहीं होता। सुबह सज-धजकर धरना स्थल पर पहुंचना, कैमरों के सामने दो-चार कड़े बयान देना, और फिर दोपहर के भोजन और चाय-समोसे के लिए शांतिपूर्ण ढंग से बिखर जाना। इस कठिन तपस्या को देखकर वाकई सरकार के पसीने छूट जाने चाहिए। निकेई एशिया वालों को शायद भारत की इस ‘समोसा क्रांति’ की गहराई का अंदाजा नहीं है। उन्हें लगता है कि संसद परिसर में गांधी मूर्ति के सामने दो घंटे बैठकर रील बना लेने से सत्ता बदल जाएगी।
इधर सरकार इस ‘दबाव’ से इतनी डरी हुई है कि वह हर राज्य में विपक्षी किलों को ढहाने की योजना पर काम कर रही है। वहीं विपक्ष इस ‘नैतिक जीत’ का जश्न मना रहा है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ ट्रेंड चला दिया। इस भारी दबाव के बीच, आम जनता भी हैरान है कि काश ऐसा ही दबाव महंगाई और बेरोजगारी पर भी बन पाता। पर खैर, विदेशी मीडिया की इस सकारात्मकता की दाद देनी पड़ेगी, जो हमारी सुस्त राजनीति में भी ‘हॉलीवुड’ का रोमांच ढूंढ लेती है। ‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि सरकार हिले न हिले, विदेशी अखबारों के पन्ने जरूर हिल रहे हैं!
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