वाह! क्या गजब का टाइम ट्रैवल है। जब पूरी दुनिया चैटजीपीटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मंगल ग्रह पर इंसानी बस्ती बसाने की सोच रही है, तब हमारे देश के कुछ परम ज्ञानी नौजवान आज भी 1947 की धूल झाड़ रहे हैं। ‘दि प्रिंट’ का यह लेख वाकई आंखें खोलने वाला है, जो हमें याद दिलाता है कि शर्जील इमाम साहब की राजनीति आज भी जिन्ना, इक़बाल और विभाजन के उसी भूतिया बंगले में कैद है, जहां से बाहर निकलने का रास्ता वे शायद खुद भी भूल चुके हैं।
भविष्य की बात पुरानी, जिन्ना की वही कहानी
क्रांति का मतलब तो हम आम लोग यही समझते थे कि समाज को आगे ले जाया जाए, कुछ नया सोचा जाए। लेकिन शर्जील बाबू ने हमें सिखाया कि असली क्रांति तो इतिहास के मलबे में दबे जिन्ना के चश्मे और इक़बाल के पुराने तराने को दोबारा चमकाने में है। क्या गजब का विजन है! आज का युवा रोजगार, महंगाई और विकास जैसी ‘फालतू’ चीजों पर बहस कर रहा है, जबकि असली मुद्दा तो यह होना चाहिए कि अस्सी साल पहले किसने, किससे और क्या कहा था। आखिर इतिहास की कब्र खोदे बिना नया भारत कैसे बनेगा?
इतिहास की प्रयोगशाला के नए वैज्ञानिक
शर्जील इमाम जैसे ‘बुद्धिजीवियों’ के लिए इतिहास कोई सीख नहीं, बल्कि एक पुराना रिकॉर्ड है जिसे वे अपनी सुविधा अनुसार बार-बार बजाना चाहते हैं। जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और इक़बाल की शायरी के कॉकटेल से वे जो राजनीतिक नुस्खा तैयार कर रहे हैं, उसकी एक्सपायरी डेट विभाजन के साथ ही निकल चुकी थी। लेकिन कबाड़खाने से पुरानी चीजें ढूंढकर उसे ‘नया विमर्श’ बताना भी एक कला है, और इस कला में हमारे जेएनयू मार्का स्वघोषित मसीहा वाकई उस्ताद हैं।
इस आधुनिक दौर में जब देश डिजिटल क्रांति और ग्लोबल लीडरशिप की बातें कर रहा है, तब हमारे शर्जील मियां विभाजन के दर्दनाक अध्यायों को फिर से जीवित करने का अथक प्रयास कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि उनके निजी कैलेंडर की सुई साल 1947 पर आकर हमेशा के लिए अटक गई है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर अतीत के घावों को कुरेदना और फिर खुद को ‘पीड़ित’ घोषित करना, वाकई एक बेहतरीन टाइमपास है।
काक-वाणी की अंतिम चुटकी
कौआ कान ले गया की तर्ज पर, ये नेता अतीत का वो हिस्सा लेकर भागे हैं जिसका आज की पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य से कोई लेना-देना नहीं है। शर्जील बाबू की राजनीति को देखकर लगता है कि वे देश को आगे नहीं, बल्कि रिवर्स गियर लगाकर सीधे बंटवारे के काले दौर में ले जाना चाहते हैं। सलाह यही है कि इतिहास के पन्नों से बाहर निकलिए हुजूर, बाहर धूप बहुत तेज है और 21वीं सदी का भारत अब जिन्ना और इक़बाल के पुराने फॉर्मूले के जाल में फंसने के मूड में बिल्कुल नहीं है। अतीत के भूतों के साथ खेलने वालों को अक्सर वर्तमान बड़ी बेरहमी से जगाता है!
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