यमुना नदी के शांत किनारे पर एक विशाल और हरा-भरा जामुन का पेड़ था। उस पेड़ पर ‘रक्तमुख’ नाम का एक अत्यंत चतुर और दयालु बंदर रहता था। उसी नदी के ठंडे पानी में ‘करालमुख’ नाम का एक बूढ़ा मगरमच्छ भी रहता था। दोनों के बीच एक ऐसी गहरी और अटूट दोस्ती थी, जिसकी मिसाल पूरी नदी के जीव देते थे। रोज रक्तमुख पेड़ से मीठे-मीठे जामुन तोड़कर नीचे गिराता और करालमुख उन्हें बड़े चाव से खाता। दोनों घंटों बैठकर अपने सुख-दुख साझा करते थे। उनकी दोस्ती सिर्फ स्वार्थ की नहीं, बल्कि दो दिलों का सच्चा मेल थी।
कर्तव्य और मित्रता का संघर्ष
एक दिन, करालमुख कुछ जामुन अपनी पत्नी के लिए घर ले गया। जामुन खाकर उसकी पत्नी के मन में लालच आ गया। उसने सोचा, “जो बंदर रोज इतने मीठे जामुन खाता है, उसका कलेजा (दिल) कितना मीठा और स्वादिष्ट होगा!” उसने करालमुख से बंदर का दिल लाने की जिद पकड़ ली। करालमुख ने उसे बहुत समझाया कि वह उसका परम मित्र है, लेकिन पत्नी ने प्राण त्यागने की धमकी दे दी। करालमुख धर्मसंकट में पड़ गया। एक तरफ उसकी अर्धांगिनी का जीवन था, और दूसरी तरफ वह मित्र जिसने उसे निस्वार्थ प्रेम दिया था। भारी मन और आंसुओं के साथ, करालमुख ने अपनी पत्नी के जीवन के लिए अपने मित्र की बलि चढ़ाने का कठोर निर्णय लिया।
विश्वासघात की गहरी नदी
अगले दिन, करालमुख उदास मन से जामुन के पेड़ के पास गया और बोला, “प्रिय मित्र, मेरी पत्नी तुम्हारी इस उदारता से बहुत प्रसन्न है। उसने आज तुम्हें अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया है।” अपने मित्र पर अटूट विश्वास रखने वाला रक्तमुख बिना किसी संदेह के तुरंत पेड़ से उतरा और करालमुख की मजबूत पीठ पर बैठ गया।
जैसे ही वे नदी के बीचों-बीच पहुंचे, जहाँ पानी बहुत गहरा और तेज था, करालमुख का दिल बैठ गया। अपने मित्र की मासूमियत देखकर उसकी आंखों से आंसू बह निकले। उसने रोते हुए कहा, “हे मित्र! मुझे क्षमा करना। मैं तुम्हें दावत पर नहीं, बल्कि मौत के मुंह में ले जा रहा हूँ। मेरी पत्नी को जीवित रहने के लिए तुम्हारे दिल की जरूरत है।”
बुद्धिमत्ता का खेल और अंतिम विदाई
यह सुनकर रक्तमुख के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिसे उसने अपना भाई माना, उसी ने उसकी पीठ में छुरा घोंप दिया था। लेकिन रक्तमुख ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी भावनाओं को वश में किया और मुस्कुराते हुए कहा, “अरे मेरे प्यारे भाई! तुमने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई? हम बंदर अपना दिल हमेशा जामुन के पेड़ के कोटर (खोखले हिस्से) में ही सुरक्षित रखकर घूमते हैं। मेरा दिल तो पेड़ पर ही रह गया है। चलो, वापस चलें ताकि मैं तुम्हें अपना दिल खुशी-खुशी सौंप सकूं।”
मूर्ख मगरमच्छ बंदर की इस चाल को समझ नहीं पाया और तुरंत किनारे की तरफ मुड़ गया। जैसे ही वे नदी के किनारे पहुंचे, रक्तमुख ने एक जोरदार छलांग लगाई और पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर जा बैठा। उसकी आँखों में गहरे दर्द के आँसू थे। उसने नीचे खड़े मगरमच्छ से कहा, “हे धोखेबाज! क्या कोई जीव अपने दिल के बिना जीवित रह सकता है? तूने न केवल मेरी जान लेने की कोशिश की, बल्कि हमारी पवित्र दोस्ती की हत्या भी कर दी। शरीर के घाव तो भर जाते हैं, लेकिन विश्वासघात का घाव कभी नहीं भरता। अब हमारे बीच का सब कुछ खत्म हो गया।”
कहानी की सीख
कहानी की सीख (Moral of the Story):
पंचतंत्र की इस प्रसिद्ध नैतिक कहानी से हमें दो बेहद महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं। पहली यह कि संकट के समय कभी भी अपना धैर्य और मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए; कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सूझबूझ से काम लेकर अपनी रक्षा की जा सकती है। दूसरी सीख यह है कि विश्वास ही किसी भी रिश्ते की सबसे मजबूत नींव होती है, और एक बार जब विश्वास टूट जाता है, तो वह रिश्ता हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। इसलिए कभी भी किसी के भरोसे का गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए।