सच्चे मित्र का बलिदान: पंचतंत्र की एक सीख

एक अनोखा परिवार और गहरा विश्वास

एक छोटे से गाँव में देवदत्त नाम का एक गरीब किसान अपनी पत्नी शारदा और छोटे बेटे आरव के साथ रहता था। उनके घर में एक और सदस्य था – ‘चीकू’, एक छोटा सा नेवला। देवदत्त ने चीकू को तब बचाया था जब वह बहुत छोटा और घायल था। समय के साथ, चीकू उनके परिवार का अटूट हिस्सा बन गया। वह आरव के साथ खेलता और उसकी रक्षा करता। शारदा भी उसे अपने बच्चे की तरह ही प्यार करती थी, लेकिन कभी-कभी उसके मन में यह डर आ जाता था कि आखिर वह एक जानवर ही तो है।

वह भयानक दोपहर और अनहोनी की आशंका

एक दोपहर, देवदत्त खेत पर गया हुआ था। शारदा को कुएं से पानी लाने जाना था। उसने सोते हुए आरव को पालने में सुलाया और चीकू को उसके पास बैठा दिया। शारदा ने चीकू से कहा, “चीकू, मैं अभी आती हूँ। मेरे लाल का ध्यान रखना।” चीकू ने अपनी वफादार आँखों से जैसे हामी भरी।

शारदा के जाने के कुछ ही समय बाद, कमरे की खिड़की से एक विशाल और जहरीला काला साँप रेंगता हुआ अंदर आ गया। वह सीधे आरव के पालने की तरफ बढ़ रहा था। चीकू की नजर उस पर पड़ी। अपने नन्हे मालिक की जान खतरे में देख, चीकू का खून खौल उठा। वह बिना अपनी जान की परवाह किए उस भयानक साँप पर टूट पड़ा।

खून से सना वफादार और माँ का क्रोध

कमरे में एक भयानक संघर्ष हुआ। चीकू छोटा था, लेकिन उसका साहस विशाल था। आखिरकार, चीकू ने साँप को टुकड़ों में काट दिया और अपने नन्हे मालिक की जान बचा ली। इस लड़ाई में चीकू का मुँह और शरीर साँप के खून से सन गया था। अपनी जीत और वफादारी की खुशी में, चीकू अपनी मालकिन को यह बताने के लिए मुख्य द्वार पर बैठ गया कि सब ठीक है।

जैसे ही शारदा पानी का घड़ा लेकर लौटी, उसने चीकू को दरवाजे पर देखा। चीकू के मुँह पर खून देखकर शारदा का दिल दहल गया। उसके मन में केवल एक ही विचार आया – “इस जानवर ने मेरे बच्चे को मार डाला!” क्रोध और घबराहट में उसने सोचने-समझने की शक्ति खो दी। उसने पानी से भरा भारी मिट्टी का घड़ा पूरी ताकत से चीकू के ऊपर दे मारा।

पछतावे के आंसू और अमर सीख

एक चीख के साथ चीकू वहीं ढेर हो गया। मरते समय भी उसकी आँखों में अपनी मालकिन के लिए कोई नफरत नहीं, बल्कि एक अजीब सा दर्द और सवाल था। शारदा रोती-चिल्लाती हुई कमरे के अंदर भागी। लेकिन वहाँ का नजारा देखकर उसके पैर सुन्न हो गए। आरव पालने में सुरक्षित सो रहा था और मुस्कुरा रहा था, जबकि जमीन पर एक विशाल काले साँप के टुकड़े बिखरे पड़े थे।

शारदा को अपनी भूल का अहसास हुआ। वह दौड़कर बाहर आई और चीकू के बेजान शरीर को अपनी गोद में उठा लिया। उसने चीकू को जगाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। वफादार चीकू हमेशा के लिए सो चुका था।

कहानी की सीख

इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह अमूल्य सीख मिलती है कि क्रोध और जल्दबाजी में लिया गया फैसला हमेशा विनाशकारी होता है। बिना सोचे-समझे किया गया कार्य जीवनभर का ऐसा घाव देता है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। इसलिए, किसी भी परिस्थिति में सच जाने बिना कोई कदम नहीं उठाना चाहिए।

कागा जी