समाजवाद का नया ‘पारिवारिक’ पैकेज: अखिलेश यादव की ‘घर-घर संसद’ योजना

लो जी, आखिरकार समाजवाद की सबसे क्रांतिकारी परिभाषा सामने आ ही गई! अब तक हम मूर्ख लोग समझते थे कि लोकतंत्र में जनता के बीच से नेता निकलते हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने हमारी राजनीतिक अज्ञानता को दूर करते हुए ज्ञान की वह गंगा बहाई है, जिसमें डुबकी लगाकर ‘परिवारवाद’ भी अब ‘पुण्य-काम’ नजर आने लगा है। अखिलेश बाबू का मानना है कि कभी-कभी परिवारवाद के भी अपने फायदे होते हैं, और क्यों न हों? जब संसद भेजने के लिए अपने ही घर में पांच-पांच ‘रत्न’ तैयार बैठे हों, तो बाहर जाकर उम्मीदवार ढूंढ़ने की सिरदर्दी कौन पाले? आखिर ‘लोकल फॉर वोकल’ का असली मतलब तो घर के ही लोगों को बढ़ावा देना है ना!

डाइनिंग टेबल पर ‘संसदीय दल’ की बैठक

जरा सोचिए, इस ‘पारिवारिक समाजवाद’ के कितने व्यावहारिक फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाने के लिए किसी महंगे होटल या हॉल को बुक करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सुबह की चाय पर डाइनिंग टेबल पर ही संसदीय दल की बैठक हो जाती है। अखिलेश जी चाय की चुस्की लेते हुए कहते होंगे, “हां भाई, आज संसद में कौन सा मुद्दा उठाना है?” और उधर से भाभी जी, भाई साहब और भतीजे मिलकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर देते होंगे। इसे कहते हैं न्यूनतम खर्च में अधिकतम लोकतंत्र! किसी बाहरी नेता के बगावत करने का कोई चांस ही नहीं, क्योंकि बगावत की सजा सीधे ‘रात का खाना न मिलना’ हो सकती है।

टिकट बंटवारे का झंझट हमेशा के लिए खत्म

दूसरे राजनीतिक दलों में टिकट के लिए सिर-फुटौवल मची रहती है, दफ्तरों पर प्रदर्शन होते हैं। लेकिन हमारी प्यारी सपा में? वहां तो टिकट बांटना उतना ही आसान और शांतिपूर्ण है जितना दिवाली पर रिश्तेदारों को सोनपापड़ी का डिब्बा सौंपना। बस, अलमारी खोली, पांच टिकट निकाले और घर के होनहारों में बांट दिए। न किसी सर्वे की जरूरत, न किसी जमीनी कार्यकर्ता की राय लेने की झंझट। और जो बेचारे साधारण कार्यकर्ता सालों से दरी बिछा रहे हैं, झंडे उठा रहे हैं? अरे भाई, उनका काम तो सिर्फ दरी बिछाना ही है, संसद की ठंडी हवा खाने के लिए तो ‘शाही परिवार’ के सदस्य ही सबसे उपयुक्त हैं!

काक-वाणी का निष्कर्ष

अखिलेश जी के इस नए सिद्धांत ने राजनीति विज्ञान के प्रोफेसरों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब वह दिन दूर नहीं जब विश्वविद्यालयों में राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम में एक नया अध्याय जोड़ा जाएगा – “पारिवारिक समाजवाद: एक दिव्य वरदान”। काक-वाणी तो बस यही कहेगी कि हे उत्तर प्रदेश की जनता, तुम बस वोट देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करो, बाकी संसद में बैठकर ‘पारिवारिक पिकनिक’ मनाने का काम तो माननीय नेता जी का परिवार खुद संभाल लेगा। जय हो इस अनोखे समाजवाद की!


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कागा जी