भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहाँ सजा और पुरस्कार के नियम बिल्कुल अनोखे हैं। साधारण दुनिया में नियम है कि जो अच्छा काम करे, उसे इनाम मिले। लेकिन हमारे महान संघीय ढांचे में नियम बिल्कुल उल्टा है। अगर आपने सरकारी नीतियों को मानकर, समझदारी दिखाते हुए जनसंख्या नियंत्रण कर लिया, तो बधाई हो—संसद में आपका प्रतिनिधित्व कम कर दिया जाएगा! और अगर आपने ‘हम दो, हमारे बहत्तर’ वाले फॉर्मूले पर चलकर देश की आबादी बढ़ाने में ऐतिहासिक योगदान दिया है, तो पुरस्कार स्वरूप आपकी झोली में अतिरिक्त लोकसभा सीटें डाल दी जाएंगी।
अधिक बच्चे, अधिक सांसद: लोकतंत्र का नया गणित
TheWire.in ने बड़ी मासूमियत से लिख दिया कि अगले परिसीमन में सिर्फ ‘संख्या’ नहीं, बल्कि ‘संघीय निष्पक्षता’ का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। अब भला इस देश के नीति-निर्माताओं और सत्तारूढ़ दल को ‘निष्पक्षता’ जैसी अमूर्त चीजों से क्या लेना-देना? उनके लिए तो लोकतंत्र केवल सिर गिनने का खेल है—चाहे वे सिर बेरोजगारी और भुखमरी की लाइन में ही क्यों न खड़े हों! उत्तर भारत के राज्यों ने देश की आबादी बढ़ाने में जो दिन-रात पसीना बहाया है, क्या उसका उन्हें कोई फल नहीं मिलना चाहिए? दक्षिण भारत के राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में निवेश करके जो ‘भारी भूल’ की है, उसकी सजा तो उन्हें भुगतनी ही होगी। आखिर उन्होंने देश को ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ यानी चुनावी वोट देने में कंजूसी जो की है!
‘फेडरल फेयरनेस’ पर हंसती हमारी व्यावहारिक राजनीति
विपक्ष चिल्ला रहा है कि यह दक्षिण भारत के साथ घोर अन्याय है। अरे भाई, जब हमारे पास ‘संसद की नई चमचमाती भव्य इमारत’ तैयार है, तो उसमें सीटें खाली थोड़े ही रखनी हैं! उसे भरने के लिए हमें भारी मात्रा में नए सांसदों की जरूरत है, और वे सांसद वहीं से आएंगे जहाँ जनता ने जनसंख्या उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया है। सत्तारूढ़ दल की चुनावी मशीनरी को अच्छी तरह पता है कि हिंदी पट्टी में सीटें बढ़ने का सीधा मतलब है—सत्ता की चाबी हमेशा के लिए अपनी जेब में सुरक्षित कर लेना। ऐसे में ‘फेडरल फेयरनेस’ की बातें सिर्फ अंग्रेजी के अखबारों के पन्नों पर ही अच्छी लगती हैं, जमीन पर तो ‘जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी संसद’ का ही सिक्का चलेगा।
काक-वाणी की राय बिल्कुल साफ है: दक्षिण भारत को अब रोना बंद करना चाहिए। अगर वे सचमुच अपनी राजनीतिक ताकत बचाना चाहते हैं, तो उन्हें आज ही से ‘मिशन मोड’ में आकर जनसंख्या बढ़ाने का राष्ट्रीय अभियान शुरू कर देना चाहिए। वरना, आने वाले समय में वे सिर्फ टैक्स चुकाते रहेंगे और उत्तर भारत के सांसद संसद में बैठकर तय करेंगे कि देश कैसे चलेगा। वाह रे हमारा अद्भुत भारतीय परिसीमन, जो समझदारी को सजा और लापरवाही को सत्ता का ताज पहनाता है!
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