हर एक करम यहां, इंसान के दस्तूर में था। लेकिन किसी ने सोचा न था कि वह ईंटों के गिरजे में भी हो सकता है।
गोपाल शर्मा एक ऐसे इंसान थे जो कभी जाने कैसे एक गुमनामी में खो गए। उनकी पत्नी, बच्चों और दोस्तों ने उन्हें खोजने की बहुत कोशिश की, लेकिन नतीजा हमेशा निराशाजनक रहा।
उनके घर में एक बच्चे का निर्माण चल रहा था, जिसे पूरा करने के लिए वे घर के इंजीनियर से संपर्क करते रहे। इंजीनियर ने उनसे सिर्फ एक काम करने की मांग की – सुडौल की फलतू ईंटों को अपने घर के सही जगह पर रखना। उन्होंने इस नए काम को शुरू किया और फिर जाने कैसे ईंटों का एक दिवाना उनको खीचने लगा।
अगले दिन उन्होंने फिर से ईंटों को सही जगह पर रखने का काम शुरू किया, लेकिन फिर से वहीं दिवाना उन्हें खींचने लगा। गोपाल ने सोचा कि शायद ये उनकी उम्र के कुछ एहसान हों जो कभी न भुलाए गए थे। लेकिन सच्चाई कुछ और थी।
एक महीने बाद जब ईंट के कुछ गिरजे खोले गए तो एक शव उन्हें मिला जो उनके गिरजे में था। शव गोपाल के अंदर पैदा एहसास को जागृत करता गया और वह बता पाया कि ये उस का शरीर था।
गोपाल ने अपने इंजीनियर से बात की और उन्हें शव के अवशेषों को संग्रहित करने को कहा जिसके बाद उन्होंने शरीर को एक समाज के सदस्य के लिए सौंपा।
इसके बाद गोपाल को उस शव का पता लगाने और समाज सेवा में अपना जीवन व्यतीत करने का लगाव बढ़ा। वह अब 50 साल का हो चुका था और एक विदेशी शर्मा कार्यक्रम में शामिल होने से पहले उदास महसूस कर रहा था।
उसने सोचा कि ये कैसे संभव है कि एक बेसमझ ईंट गिरजा उसे इतनी समाज सेवा करने का अवसर दे देता है। लेकिन जब उसने स्वयं को स्मृति के साथ देखा तो उसे याद आया कि एक ईंट ने उसे शर्मा कार्यक्रम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था।
गोपाल शर्मा बहुत खुश होता है उन लोगों की मदद करते हुए जो उसे कभी नहीं जानते थे। उसने एक ईंट से एक बड़ा सपना देखा था और उसे पूरा करने के लिए वह इतना कुछ कर रहा था।
अंत में, गोपाल शर्मा ने जान लिया कि एक छोटी सी ईंट भी हमेशा अपने लक्ष के पास नहीं होती है। उसने अपना दृष्टिकोण, अपनी मनसा और अपनी समझ का उपयोग किया जिससे उसने बहुत सारी मदद की।
इसके बाद से वह हमेशा नयी समस्याओं को हल करने के एक नजरिये से देखने लगा, जो किसी को इनाम नहीं देते। गोपाल शर्मा हमेशा याद रखेंगे कि एक ईंट ने उन्हें अपने सपनों तक पंहुचाया है और अब वह समुदाय के लिए एक मार्गदर्शक बन चुका है।