दुनिया में दो चीजें कभी खत्म नहीं होतीं—एक तो सरकारी फाइलों पर लगी लाल फीताशाही और दूसरी भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर चलने वाली ‘अंतिम चरण’ की वार्ता। सालों से देश की जनता सुन रही है कि ‘व्यापार समझौता बस होने ही वाला है’। इतनी बार तो भारत-अमेरिका संबंधों में ‘डील’ शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ, जितनी बार दोनों देशों के शीर्ष नेता एक-दूसरे को ‘जादू की झप्पी’ दे चुके हैं। लेकिन काक-वाणी की पैनी नजर कहती है कि जैसे ही बात टैरिफ यानी सीमा शुल्क पर आती है, अंकल सैम की गर्मजोशी अचानक एक ठंडे ‘टैक्स कैलकुलेटर’ में बदल जाती है।
जब ‘हाग-लोमेसी’ टैरिफ के खूंटे से टकराई
बिजनेस लाइन के सूत्रों की मानें तो बेचारी अंतरिम ट्रेड डील एक बार फिर टैरिफ और ‘राजनीतिक चिंताओं’ की बलि चढ़ गई है। अब आप पूछेंगे कि यह ‘राजनीतिक चिंता’ क्या बला है? तो इसे साधारण देसी भाषा में समझिए—इसका मतलब है चुनाव! अमेरिका चाहता है कि भारत उसके बादाम, सेब और डेयरी प्रोडक्ट्स पर से टैक्स हटा दे ताकि उनके किसान खुश होकर चुनाव में वोट दें। उधर, भारतीय सत्ताधीशों को डर है कि अगर अमेरिकी दूध और सेब भारत के बाजारों में भर गए, तो स्वदेशी किसान कहीं चुनावी मौसम में झंडा न उठा लें। यानी, ‘वसुधैव कुटुंबकम’ अपनी जगह है, लेकिन अपने वोट बैंक को बचाना सबसे पहला धर्म है!
दोस्ती अपनी जगह, टैक्स अपनी जगह
काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि अगर कूटनीति केवल बड़े-बड़े स्टेडियमों में ‘हाउडी’ या ‘नमस्ते’ के नारे लगाने से चलती, तो आज वॉशिंगटन में भारतीय समोसे और दिल्ली में अमेरिकी सामान मुफ्त बिक रहे होते। लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका अपनी हार्ले-डेविडसन और मेडिकल उपकरणों पर कम टैक्स चाहता है, और भारत अपने स्टील और कपड़ों के लिए अमेरिकी बाजार का दरवाजा खोलना चाहता है। अब जहाँ दोनों पक्ष केवल अपना सामान बेचना चाहते हों और दूसरे का खरीदने से बच रहे हों, वहाँ समझौता कैसे हो? यह तो वही बात हुई कि शादी के मंडप में दूल्हा और दुल्हन, दोनों ही एक-दूसरे से दहेज मांग रहे हों!
फिलहाल, जब तक दोनों देशों में चुनावी बादल छंट नहीं जाते, यह महा-ट्रेड डील ठंडे बस्ते में ही आराम फरमाएगी। नेताओं के लिए लाल कालीन पर फोटो खिंचवाना बहुत आसान है, लेकिन टैरिफ की एक भी दर कम करना अपनी राजनीतिक गर्दन पर छुरी चलाने जैसा है। इसलिए काक-वाणी की सलाह है कि अगली बार जब दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष मिलें, तो व्यापार पर चर्चा करने के बजाय केवल गले मिलने का ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ बनाने पर ध्यान दें। कम से कम उसमें कोई टैरिफ या कस्टम ड्यूटी तो नहीं लगती!
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