वाह रे हमारी याददाश्त! वैसे तो हमें पिछले चुनाव में किए गए वादे याद नहीं रहते और न ही यह याद रहता है कि पिछले साल किस आपदा में कितने लोग बेघर हुए थे। लेकिन जब बात सौ साल पुरानी ‘हैफा की लड़ाई’ की हो, तो हमारी ऐतिहासिक चेतना अचानक कुलांचें मारने लगती है। ‘द हिंदू’ के हालिया लेख ने याद दिलाया कि कैसे यादों की भी अपनी एक राजनीति होती है। धन्य हैं हमारे आज के हुक्मरान, जिन्हें इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने में महारत हासिल है, खासकर तब जब उन मुर्दों की राख से वर्तमान की चुनावी फसल को खाद मिल सके।
जब दिल्ली के चौराहे पर दौड़े इजरायली घोड़े
आपको याद ही होगा, कुछ साल पहले तक दिल्ली का ‘तीनमूर्ति चौक’ सिर्फ एक आम चौराहा था, जहां लोग लाल बत्ती पर खड़े होकर अपनी किस्मत और ट्रैफिक को कोसते थे। लेकिन अचानक हमारे परम प्रतापी नीति-निर्माताओं को याद आया कि अरे, ये तीन मूर्तियां तो 1918 में हैफा (अब इजरायल में) को आजाद कराने वाले भारतीय जवानों की हैं! बस फिर क्या था, रातों-रात इस चौराहे का नाम ‘तीनमूर्ति हैफा चौक’ रख दिया गया। अब वहां से गुजरने वाला हर वह आम नागरिक, जो अपनी फटी जेब में महंगाई का रोना रो रहा होता है, अचानक खुद को वैश्विक महाशक्ति और इजरायल का तारणहार महसूस करने लगता है। इसे कहते हैं राष्ट्रवाद की जादुई क्रोनोलॉजी!
इतिहास की मलाई और आज की कढ़ाई
जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद के लांसरों ने जो किया, वह निस्संदेह वीरता की पराकाष्ठा थी। बिना किसी आधुनिक हथियार के, सिर्फ घोड़ों और तलवारों के दम पर ऑटोमन साम्राज्य की मशीनगनों को धूल चटा देना कोई छोटी बात नहीं थी। लेकिन मजा तब आता है जब इस ऐतिहासिक बहादुरी का इस्तेमाल आज की विदेश नीति और घरेलू वोट बैंक को साधने के लिए किया जाता है। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को इतिहास की धूल से निकालकर सीधे देश की मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।
सौ साल पहले जो सैनिक ब्रिटिश हुकूमत के झंडे तले लड़े थे, आज उन्हें ‘परम राष्ट्रवादी’ की श्रेणी में फिट करके पेश किया जा रहा है। वैसे, यह कला सिर्फ हमारी वर्तमान सरकार को ही आती है कि कैसे एक सदी पुराने युद्ध को आज की कूटनीतिक जीत की तरह पेश कर दिया जाए। युवाओं को रोजगार मिले न मिले, लेकिन इतिहास के पन्नों से देशभक्ति का ऐसा च्यवनप्राश तैयार किया जा रहा है, जिसे चाटकर जनता बेरोजगारी का दर्द भूल जाए।
‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि इतिहास को इतना भी मत निचोड़िए कि वर्तमान बिल्कुल सूखा रह जाए। पर क्या करें, जब तक जनता को हैफा की गलियों की याद दिलाकर असल मुद्दों से भटकाया जा सकता है, तब तक राजनीति के ये घोड़े बिना घास के भी दौड़ते रहेंगे।
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