‘कैपिटल हिल’ पर समोसा डिप्लोमेसी: अमेरिकी लोकल राजनीति में ‘देसी’ तड़का!

वाह! क्या खबर है। ‘द प्रिंट’ की ताजा रिपोर्ट कहती है कि भारतीय-अमेरिकी उम्मीदवार अब अमेरिकी संसद यानी ‘कैपिटल हिल’ पर नजरें टिकाए बैठे हैं। लेकिन भाई, सीधे छत पर छलांग थोड़ी न मारी जाती है! इसलिए ‘स्टेप 1’ है—लोकल राजनीति। जी हां, काउंटी का कचरा प्रबंधन, स्कूल बोर्ड की मीटिंग्स और स्थानीय पार्क की बाउंड्री वॉल बनवाना। यानी भारत के किसी आरडब्ल्यूए (RWA) अंकल की आत्मा अब वाशिंगटन और टेक्सास के लोकल चुनावों में चुनाव चिह्न ढूंढ रही है।

आरडब्ल्यूए (RWA) मानसिकता की अंतरराष्ट्रीय उड़ान

भारतीयों के खून में ही राजनीति का डीएनए दौड़ता है। हमारे देश का इंसान जब तक किसी सोसाइटी की कमिटी का सेक्रेटरी न बन जाए, उसे खाना हजम नहीं होता। अब यही महान परंपरा अमेरिका में भी फल-फूल रही है। किसी ज़माने में जो ‘गुप्ता जी’ दिल्ली की सोसाइटी में लिफ्ट के बिल पर झगड़ा करते थे, उनके सुपुत्र अब न्यू जर्सी के स्कूल बोर्ड में समोसा पार्टी रखकर वोट मांग रहे हैं। कैपिटल हिल तो सिर्फ बहाना है, असली मकसद तो अमेरिकी नेताओं को यह सिखाना है कि ‘चाय-पानी’ और ‘चुगलखोरी’ के बिना लोकतंत्र अधूरा है!

‘नमस्ते’ और ‘आइडेंटिटी’ का अनोखा तड़का

इन उम्मीदवारों की चुनावी रणनीति भी गजब की है। एक तरफ तो ये धाराप्रवाह अमेरिकी एक्सेंट में ‘ज़ोनिंग लॉ’ और ‘पब्लिक सेफ्टी’ पर लंबा भाषण देंगे, और दूसरी तरफ फंड जुटाने के लिए ‘देसी कम्युनिटी’ के सामने अपनी भारतीय जड़ों की दुहाई देंगे। चाहे वे डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन, चुनाव आते ही सबको अपनी ‘दादी माँ की रेसिपी’ और ‘नमस्ते’ का महत्व समझ आ जाता है। काक-वाणी ऊंचे पेड़ से देख रही है कि कैसे ये चतुर नेता गोरे अमेरिकियों को ‘डाइवर्सिटी’ के नाम पर और भारतीय वोटरों को ‘संस्कारों’ के नाम पर टोपी पहना रहे हैं।

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर ‘विश्वगुरु’ बनने का भ्रम

इधर अमेरिका में कोई देसी उम्मीदवार काउंटी कमिश्नर की एक मामूली कुर्सी जीतता है, और उधर भारत के व्हाट्सएप ग्रुप्स में ढोल-नगाड़े बजने लगते हैं। संदेश फैल जाता है: “देखा! अमेरिका पर भी अब हमारा ही कब्जा है!” भाई साहब, थोड़ा रुकिए! वह अमेरिका का नागरिक है, वो आपके मोहल्ले का नाला साफ करवाने नहीं आएगा। वह कैपिटल हिल पहुँच भी गया, तो अपने अमेरिकी वोटरों की सुनेगा, आपकी वीजा फाइल क्लियर करवाने की सिफारिश नहीं करेगा।

खैर, ‘काक-वाणी’ की तरफ से इन भावी अमेरिकी हुक्मरानों को बहुत-बहुत बधाई। बस डर इस बात का है कि कहीं कल को कैपिटल हिल के कैंटीन में ‘नाश्ते में ढोकला और डोसा क्यों नहीं मिला’ इस पर कोई बिल पास न हो जाए!


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कागा जी