लाल आँख का काला चश्मा: बीजिंग की शर्तों पर ‘विश्वगुरु’ की महा-कूटनीति!

वाह! ‘द कारवां’ पत्रिका ने भी कमाल कर दिया है। हमारी सुख-शांति और ’56 इंची’ गौरव में बेवजह खलल डालते हुए लिख दिया कि भारत-चीन संबंध अब पूरी तरह से बीजिंग की शर्तों पर तय हो रहे हैं। अब आप ही बताइए, क्या यह सीधा-सीधा कूटनीतिक राष्ट्रद्रोह नहीं है? हमारे तेजस्वी नेता दिन-रात ‘लाल आंखें’ दिखा-दिखाकर थक गए, और इन पत्रकारों को लगता है कि बीजिंग अपनी चला रहा है! अरे भाई, हमने उनके टिकटॉक और पबजी बैन कर दिए, क्या यह कोई छोटी-मोटी सर्जिकल स्ट्राइक है?

‘लाल आंख’ का चश्मा और कूटनीतिक उदारता

बात बिल्कुल शीशे की तरह साफ है। जब देश के सर्वोच्च नेतृत्व ने डंके की चोट पर कह दिया कि “न कोई घुसा है, न कोई घुसा हुआ है,” तो फिर बीजिंग अपनी शर्तें कैसे थोप सकता है? अब अगर चीनी सेना ने सीमा पर थोड़ा नक्शा ‘रिडिजाइन’ कर लिया, या हमारे चरवाहों को अपनी ही ज़मीन पर जाने से प्यार से रोक दिया, तो इसे ‘शर्तों पर चलना’ थोड़ी कहते हैं! इसे तो ‘विश्वगुरु’ की विशालकाय कूटनीतिक उदारता कहा जाता है। हम तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के ध्वजवाहक हैं, अगर पड़ोसी थोड़ा आगे सरक आया, तो क्या हम छोटी-छोटी बातों पर लड़ेंगे?

टिकटॉक बैन बनाम 100 बिलियन का व्यापार

रिपोर्ट में रोना रोया गया है कि चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड तोड़ रहा है और बीजिंग लद्दाख में अपनी मर्जी चला रहा है। लेकिन ‘काक-वाणी’ इस विश्लेषक वर्ग को बताना चाहती है कि यह सब एक बेहद रहस्यमयी ‘मास्टरस्ट्रोक’ का हिस्सा है। हमने चीन की कमर तोड़ने के लिए उनके सबसे खतरनाक डिजिटल हथियार ‘टिकटॉक’ को हमेशा के लिए दफना दिया। अब बीजिंग के अधिकारी अपनी चौमीन खाते हुए भारतीय रील्स नहीं देख पाते, क्या यह हमारी रणनीतिक विजय नहीं है?

रही बात उनसे सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों का कच्चा माल दोगुने दाम पर खरीदने की, तो वो पैसे तो हम उन्हें बस यह अहसास कराने के लिए दे रहे हैं कि हमारे पास पैसों की कोई कमी नहीं है। इसे व्यापार घाटा नहीं, ‘आर्थिक दबाव’ कहते हैं!

काक-वाणी का अंतिम निष्कर्ष

इसलिए ‘द कारवां’ की इस नकारात्मक रिपोर्ट पर बिल्कुल ध्यान मत दीजिए। बीजिंग अगर शर्तें तय कर रहा है, तो करने दीजिए। आखिर में उन शर्तों पर मौन सहमति की मुहर तो हमारी ही लगती है! जब तक हमारे पास बैन करने के लिए कुछ और चीनी ऐप बचे हैं और टीवी चैनलों पर चीन को ‘सबक सिखाने’ वाले एंकरों की दहाड़ कायम है, तब तक देश की विदेश नीति पूरी तरह सुरक्षित और अजेय है।


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कागा जी