Title: जीवन की रेलगाड़ी
मैं एक रेलगाड़ी हूं। जबसे मैं चलने लगी हूं, मैंने उन लोगों को कई बार देखा है जो मेरी यात्रा करते हैं। उनमें से हर एक की लाइफ में कोई स्टोरी होती है।
एक अजब गजब घटना मेरी यादों में सबसे अधिक जगह बनाती है। वो घटना है एक लड़की की जिसका नाम नीहा था।
नीहा कोई आम लड़की नहीं थी। उसके पास कोई परिवार नहीं था। उसके पास बस एक साथी थी जो कुछ बोलती ही नहीं थी।
नीहा रेलवे स्टेशन पर उतरी थी और मुंबई जाने वाली मेरी रेलगाड़ी में चढ़ी थी। नीहा के साथी की आँखों में असहज होशियारी थी। कोई उनके साथ कुछ करने वाला था या बस ऐसा महसूस करना चाहती थी वह, मुझे नहीं पता था।
जैसे ही मैं चलने लगी, नीहा सीट पर बैठ गई। उसके पास एक सड़क बेचने वाला आदमी था। वह बोलने लगा, “मैडम, यह सीट के लिए ये वाला टिकट है।”
नीहा उसका टिकट देखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह उसे नहीं ढूंढ पा रही थी। मैं भी उस आदमी को देखती थी, उसके हाथ में खाली टिकट दिखाई दे रहे थे।
नीहा सदमे में आ गई थी, वह मुझसे शिकायत करने लगी। “मेरा टिकट नहीं है, मेरा क्या होगा?”
मैंने अपनी कुछ बोलने की कोशिश की थी, लेकिन मैं तो बस थी। उस समय मैं पूरी तरह से बेकार महसूस कर रही थी।
फिर एक दिन कुछ अनोखे संयोगों से नीहा के साथी की स्थिति मुश्किल हो गई थी। वह बहुत बीमार थीं और मैं लखनऊ से होकर गुजर रही थी।
नीहा ने पूछा, “बहन आप जानती हो कोई डॉक्टर हो सकता है?”
मैंने उसे सड़क के नक्शे पर बताया कि जब मैं रेवाड़ी स्टेशन पर रुकूंगी, तो यदि वह शामिल होंगी तो संभवतः कुछ मदद मिलेगी।
वाकई नीहा, अपनी साथी के साथ बाढ़ होने से बचने के लिए मैं से उसके वक्ता हुए। अब वह मुझपर निर्भर थी।
मुझे रेवाड़ी स्टेशन पहुंचते ही उदास लोगों की भीड़ दिखी। सब एक दूसरे के साथ बातें कर रहे थे जिससे मुझे लगा कि कुछ गलत हो रहा है।
नीहा तुरंत मेरी तरफ दौड़ गई। उसने मुझे पूछा, “क्या कूच हो रहा है यहाँ पर?”
मैं उसे बताने के लिए तैयार थी। मुझे लगता था कि जो भी हो रहा है, यह नीहा के साथी के साथ सम्बन्धित है।फिर हमने एक बेचारी औरत को एक बार में संभाल लिया, वह थोड़ी देर उलट-पुलट शब्द बोलकर बताने लगी कि उन्होंने अपने ही परिवार वालों के बिना जीते जगत में नहीं रहना होगा।
यह बात सभी को स्पष्ट थी, वे सभी अपने विचारों का व्यक्ति में अभिव्यक्ति करने लगे। नीहा भी आवाज उठाकर महसूस करने लगी।
सभी का उद्देश्य जीवन में प्रगति करना है। हम सभी को अभिव्यक्ति के संग्रह और स्वतंत्रता में वृद्धि करना होगा। हम सभी को जीवन की रेलगाड़ी में आगे रखने के लिए एक-दूसरे की ज़रूरत होती है।
मुझे नीहा ने अपने साथी की मदद करने के लिए याद किया जो किसी आदमी से नहीं बोलती थी। वह मुझे आसरा था। मेरी रेलगाड़ी एक परीवर्तन थी। उस दिन से मैं नीहा का साथ देती रही और उसके साथी के साथ संबद्ध रही।
मेरे जीवन की रेलगाड़ी कुछ महत्वपूर्ण अनुभवों के बाद एक नई दिशा में घुमाया जा रहा है। भविष्य के साथी भी उन्हें इस सफ़र में परिणत करेंगे। यही रेलगाड़ी है जो हमें अगले कदमों तक ले जाएगी।