अहा! ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का यह ज्ञानवर्धक ज्ञान पढ़कर ‘काक-वाणी’ का हृदय गद्गद हो गया। शीर्षक कहता है कि जब राजनीति में ताला लग जाए, तब बौद्ध धर्म कूटनीति के बंद दरवाजे खोल सकता है। वाह! क्या अद्भुत विचार है। यानी जब आप लाल आंखें दिखाकर थक जाएं, पड़ोसियों को दिन-रात पानी पी-पीकर कोस लें और कूटनीति की मेज पर सारी फाइलें पटक कर चाय ठंडी कर लें, तो अचानक से बुद्ध की अहिंसा और करुणा याद कर लीजिए!
नेताओं का अचानक ‘निर्वाण’ प्राप्त करना
सोचिए, जो नेता चुनावी रैलियों में विरोधियों को भस्म करने की दहाड़ मारते हैं और सीमाओं पर लाल आंखें दिखाने का दावा करते हैं, वे अचानक विदेश यात्रा पर जाते ही बौद्ध भिक्षुओं की तरह मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। शांति, करुणा और मध्य मार्ग के उपदेश ऐसे झाड़े जाते हैं मानो हमारे विदेश नीति के विशेषज्ञ कल रात ही बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त करके उठे हों। जब राजनीति और अर्थशास्त्र फेल हो जाते हैं, तो धर्म हमेशा से सबसे बड़ा ‘बैकअप प्लान’ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि देश के अंदर धर्म का इस्तेमाल डराने के लिए होता है, और विदेशों में कूटनीतिक नाकामी छिपाने के लिए बौद्ध धर्म का ‘सॉफ्टवेयर’ इस्तेमाल किया जाता है।
‘अहिंसा’ का नया एक्सपोर्ट क्वालिटी पैक
हमारी विदेश नीति का यह सिद्धांत कितना पावन है! घर में हम बात-बात पर लाठी और बुलडोजर की भाषा बोलेंगे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर जैसे ही सीमा विवाद या व्यापार का पहिया फंसेगा, हम तुरंत बुद्ध के शांति संदेश का झोला खोल देंगे। “अरे भाई! हम तो बुद्ध की भूमि से हैं, युद्ध की भूमि से नहीं!” यह जुमला फेंकते ही सामने वाला देश भी समझ जाता है कि साहब की कूटनीति का तेल खत्म हो चुका है और अब ये प्राचीन इतिहास की ओट में छिप रहे हैं।
काक-वाणी का मुफ़्त परामर्श
अगर बौद्ध धर्म सच में ठप पड़ी कूटनीति को चला सकता है, तो ‘काक-वाणी’ का सुझाव है कि विदेश मंत्रालय को तुरंत एक ‘विपासना केंद्र’ में बदल देना चाहिए। द्विपक्षीय वार्ताओं में फाइलों की जगह ‘ज्ञान की कटोरी’ रखी जानी चाहिए। जब कूटनीति की मेज पर चाय की चुस्कियों के साथ ‘अष्टांग मार्ग’ की बातें होंगी, तो शायद सीमा विवाद सुलझे या न सुलझे, हमारे नेताओं का ब्लड प्रेशर जरूर कंट्रोल में रहेगा। तब तक के लिए, जब तक राजनीति का अगला ड्रामा शुरू न हो, बोलिए— राजनीतिम् शरणम् गच्छामि!
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