राम-राम भाइयों! ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है। आजकल हमारे अंतरराष्ट्रीय नीति-विशेषज्ञों और अल-जज़ीरा जैसे वैश्विक ज्ञानदाताओं की नींद उड़ी हुई है। मुद्दा बड़ा गंभीर है—बांग्लादेश और भारत के बीच ‘रिश्तों का रिसेट’ बटन जाम हो गया है। और इस जाम का कारण कोई व्यापार घाटा, सीमा विवाद या तीस्ता नदी का पानी नहीं है, बल्कि हमारी परम आदरणीय मेहमान, ढाका की पूर्व सुल्ताना, श्रीमती शेख हसीना जी हैं।
अतिथि देवो भवः… जब तक अतिथि वापस न जाए!
भारत की सनातनी परंपरा रही है—’अतिथि देवो भवः’। लेकिन जब अतिथि ऐसी पूर्व प्रधानमंत्री हो, जिसके पीछे उनका पूरा देश लाठी लेकर पड़ा हो, तो ‘देवो भवः’ का बिल थोड़ा भारी पड़ने लगता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार रोज सुबह उठकर पहला काम यही करती है—चिल्लाना कि “हसीना को वापस भेजो!” इधर हमारे विदेश मंत्रालय के बाबू चाय की चुस्की लेते हुए फाइलों के नीचे छिप रहे हैं। डिप्लोमेसी की भाषा में इसे ‘डेडलॉक’ यानी गतिरोध कहते हैं, और हमारी देसी भाषा में इसे कहते हैं—’गले की हड्डी’। न निगलते बन रहा है, न उगलते!
अल-जज़ीरा की चिंता और ढाका का दर्द
अब अल-जज़ीरा जैसा बड़ा चैनल सिर पीट रहा है कि “इस गतिरोध को आखिर क्या तोड़ेगा?” अब उन्हें कौन समझाए कि हमारे उपमहाद्वीप में गतिरोध तोड़ने के लिए किसी बड़े समझौते की नहीं, बल्कि एक अच्छी ‘बिरादरी पंचायत’ की जरूरत होती है। ढाका के नए स्वयंभू चौधरी मोहम्मद यूनुस साहब सोच रहे हैं कि नोबेल पुरस्कार पाना तो आसान था, लेकिन इस ‘पड़ोसी’ नाम की बला को संभालना कितना मुश्किल है। भारत के लिए दुविधा यह है कि अगर हसीना जी को वापस ढाका भेजा, तो दुनिया थू-थू करेगी कि संकट में साथ छोड़ दिया। और अगर उन्हें लुटियन दिल्ली के किसी सेफ हाउस में बिठाकर बिरयानी खिलाई, तो बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाओं का नया गुब्बारा फूल जाएगा।
तो फिर क्या है ‘काक-वाणी’ का नुस्खा?
इस गतिरोध को तोड़ने का एक ही नायाब तरीका है—’क्रिएटिव डिप्लोमेसी’। क्यों न हसीना जी को किसी तीसरे देश में ‘लॉन्ग-टर्म वेकेशन’ पर भेज दिया जाए, जहां का मौसम सुहाना हो और प्रत्यर्पण की संधि न हो? तब तक ढाका वाले भी समझ जाएंगे कि गुस्सा थूक कर व्यापार शुरू करना ही समझदारी है। आखिरकार, इतिहास गवाह है कि जब पड़ोसियों के बीच कोई ‘हसीना’ आ जाए, तो रिश्ते उलझते ही हैं। खैर, डिप्लोमेट्स अपनी फाइलें काले करते रहेंगे और हम ‘काक-वाणी’ से कौए की तरह कांव-कांव करके सत्ता के गलियारों को चुभते सच सुनाते रहेंगे।
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