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अधोलोक की दुखभरी कहानी चंदन के आँगन में वर्षों से वृक्ष

अधोलोक की दुखभरी कहानी

चंदन के आँगन में वर्षों से वृक्ष बैठे हुए थे। वंश की पीढ़ी तक इन वृक्षों ने शांति और समृद्धि की देर तक सहायता की। वैद्यक वृक्ष वसंत ऋतु में उनकी मेहनत का फल अपने तन में लेते थे। सदाबहार झाँवें किसी न किसी पौधे पर खिल जाती थीं। पर इन सबके जज्बातों को देखते हुए नागरिकों ने अपनी समझदारी से अधोलोक में बास्तव विकास लाने का निर्णय किया था।

अधोलोक, सुन कर ही पूरा जहाँ डर जाता था। यहाँ लोगों का रहना मुश्किल ही नहीं, जीवन जीना सात अजूबों में समाया हुआ था। सभी जानवर झुंडों में घुमते रहते थे, इनफालेन्टी में उम्मीद रखते हुए किसी न किसी निर्वासित होते थे। इसमें देश के युवा पीढ़ी ने अपनी निवेशित अविश्वसनीय क्षमता का अनुभव लिए थे। उनमें था प्रवीण, इबादत, विद्या आदि लोग जो एक साथ अधोलोक को इंसानी झोला हँसाते नजर आए।

प्रवीण बंद जहाजों के खास तकनीकी फैसलों पर कार्यरत था। वह समझता था कि जहाज जितना बड़ा हो, रूकना उतना ही मुश्किल होगा। वह मुंडे पाठशाला के सिखाने वाले थे, चाहिए जो काम हो, करके दिखाना उनकी फ़ितरत बन गई थी।

इबादत के पिता ब्रिटिश बिना हमारे देश से नज़र हटा रहे थे। उन्होंने अन्ग्रेजों और भारतीयों की संगत से ऊंचाई पा ली थी। पर उनमें सपने देखने का भी इरादा था। इन सपनों में देश के समृद्ध होने की चीख आती थी।

विद्या बुरी तरह से उपजेलों में फंस गई थी। वह बेजुबान शिकार हो चुकी थीं। हर वहनीय आदमी अपनी खुशली पर तंग आकर इसलिए उन्हें छोड़ गया था। लेकिन उसके दिल से सपने कभी नहीं भागे थे। उसके लिए एक उद्योग ठहरा जहाँ उसे दूसरों की सहायता के बारे में सोचते-सोचते बहुत कुछ सीखने को मिला।

सफर शुरू हो गया और अधोलोक में भूमि के लिए भगवान का आशीर्वाद लेते हुए वह जाने लगते हैं। शुरू में तो सब कुछ अच्छी तरह से साथ दिया जा रहा था। नागद देनें तथा सामग्री की कमी के बावजूद लोग भी अपने आप को शक्तिशाली समझते थे। पर दिन-ब-दिन भूख तथा अर्थवृत्ति की समस्याएं शामिल होने लगीं। उन्हें ज्यादा नहीं लगा कि इस देवनारायण से ये सब कैसे करवाते हैं। सब कुछ महंगा हुआ, पर उन्हें कुछ बिक्री नहीं मिलती थी। सुख के जरिये ग्रामीण विकास होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था। उन्होंने णोट्स तक समझ दिया था, फिर भी केरोसीन ज्यादा कीमत पर बिक जाता था। मेरे आँखें बंद हो गईं , लेकिन नहीं, कुछ करना तो पड़ेगा, इन सोचों में लोग एक दूसरे के सहारे खड़े रहे।

विद्या ने पंचायत का नव-निर्माण किया, इबादत ने खेती में टीम बनायी, प्रवीण ने खेन खोदने का काम भी संभाल लिया। सभी ने एक ही मंजिल के लिए स्वयंसेवा का संदेश दिया था। उन्होंने अपनी करोइली पहाड़ियों में झोपड़ी बंदी और जीवन जीना सीखा। उन्होंने अपनी मेहनत व संस्कृति के अनुसरण में विकास की मौजूदगी पाई। आज इन लोगों का उत्साह लोगों के अंदर खुलकर झलकता है, लोग उनसे सम्मान से बाते करते हैं और यह मान समाज का नेतृत्व जीसे कुछ समझते हैं।

ऐसा हुआ था कि वह नये मंगलवार को विस्फोटकों में बदल गया। लगानों में गिरफ्तारी, आम जनता का सहभागित्व नहीं आया, सब कुछ बिगड़ गया। आफते अंत नहीं हो रही थी, पर ये सारे विघटन कुछ नहीं थे, जहाँ से शुरूयाँ होती हैं, उस जगह से खत्म होती थीं।

जीवन जीना हमेशा मुश्किल होता है, लेकिन कभी-कभी इस मुश्किल से सामना करना जरूरी होता है। इन्सानी मेहनत सफलता जरूर बनाती है, जो विघटन के अंत तक नहीं रुकती। हमारी झोली साफ़ करने का फैसला पहले कुछ लोगों ने कर लिया था। आप सम्मत हो, इस फैसले में हम सहयोग प्रदान कर सकते हैं, सपने पूरे कर सकते हैं इसलिए आप भी चिंता नहीं करने की कोशिश कीजिए, क्योंकि रास्ता सफलता तक का सफर कंगाल दिखता हो, लेकिन इसमे हम से ज्यादा महत्वपूर्ण चीज हमारा इरादा होता है।

कागा जी

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