वाह! क्या दूरदर्शिता है हमारे भारतीय टीवी चैनलों की। दिल्ली के प्रदूषण, महंगाई और सड़कों के गड्ढों से जब मन भर गया, तो प्राइम-टाइम के शूरवीर विश्लेषक सीधे अल्बानिया की सड़कों पर उतर आए। हाल ही में एक नया बौद्धिक शोध परोसा गया—’अल्बानिया में अराजकता, भारत के लिए सबक?’ मानो भारत का महान लोकतंत्र इतना फुर्सत में बैठा है कि अब वह बाल्कन प्रायद्वीप के किसी छोटे से देश के उपद्रवियों से ट्यूशन लेगा!
तिराना का धुआं और दिल्ली का चश्मा
अल्बानिया की राजधानी तिराना में जब विपक्षी कार्यकर्ताओं ने पेट्रोल बम फेंके, तो हमारे देश के एसी स्टूडियो में बैठे स्वयंभू ज्ञानियों की राष्ट्रभक्ति का बल्ब अचानक जल उठा। अब भारतीय जनता को बड़े प्यार से समझाया जा रहा है कि अगर तुमने अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर नारे लगाए, तो याद रखना… तुम सीधे अल्बानिया की राह पर चल पड़ोगे! कितनी सहज और सुंदर तुलना है। कोई इन ज्ञानियों से पूछे कि जब नॉर्वे या स्विट्जरलैंड में शांति और समृद्धि होती है, तब तो आप वहां से जनहित के नियम नहीं लाते; लेकिन दुनिया के किसी कोने में दंगा हो, तो भारतीय विपक्ष के लिए ‘सबक का कैप्सूल’ तुरंत तैयार कर लिया जाता है।
प्रदर्शन की राजनीति का नया ‘इंपोर्टेड’ स्कैनर
हमारे देश में विरोध-प्रदर्शन का अपना एक समृद्ध और अनूठा इतिहास रहा है। यहां तो धरना देने वाले को भी पता होता है कि किस समय चाय-समोसे का ब्रेक लेना है और कब कैमरे के सामने भावुक होना है। लेकिन अब मीडिया के एंकर चिल्ला-चिल्लाकर बता रहे हैं कि ‘प्रदर्शन की राजनीति अब स्कैनर के तहत है’। शायद जल्द ही नया सरकारी नियम आ जाए कि किसी भी धरने की अनुमति तभी मिलेगी, जब आयोजक हलफनामा देगा कि उसके नारे और तौर-तरीके अल्बानियाई शैली से प्रेरित नहीं हैं!
देश का विपक्ष भी बेचारा हैरान-परेशान है। उन्होंने तो बस स्थानीय मुद्दे पर एक पुतला फूंकने का कार्यक्रम बनाया था, लेकिन स्टूडियो के पत्रकारों ने उसमें से यूरोप के गृहयुद्ध की गंध सूंघ ली। अगर यही हाल रहा, तो कल को किसी अन्य महाद्वीप में बिजली गुल होगी और भारतीय विपक्ष से इस्तीफा मांग लिया जाएगा कि ‘आपकी वजह से वहां अंधेरा क्यों हुआ?’
काक-वाणी का निष्पक्ष निष्कर्ष
‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि अगर विदेशी उपद्रव से ही देश चलाना है, तो फिर विदेश नीति की क्या जरूरत? जनता को भी सलाह है कि वे महंगाई और बेरोजगारी की चिंता छोड़कर अब अल्बानिया का नक्शा खंगालना शुरू कर दें। आखिर, जब देश का गोदी मीडिया इतनी दूर की कौड़ी ढूंढकर ला रहा है, तो कम से कम हमें तालियां बजाने में तो कंजूसी नहीं करनी चाहिए!
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