अहा! क्या सुरम्य, भावुक और आँखों में खुशी के आँसू ला देने वाला समाचार प्रस्तुत किया है हमारे प्रिय अंग्रेजी पत्र ‘द हिंदू’ ने। शीर्षक है— “बिलांगिंग: ए जर्नी ऑफ लव”। इसे पढ़कर साधारण जनता भले ही सोच में पड़ जाए, लेकिन ‘काक-वाणी’ का दिल तो गद्गद हो गया। हमें तो लगता था कि सोनिया गांधी जी का भारत आगमन महज एक संयोग और बाद में राजनीति का एक अध्याय था, लेकिन मीडिया के गुलाबी चश्मे से देखिए तो यह रोमियो-जूलियट से भी ज़्यादा पवित्र और लैला-मजनूं से भी ज़्यादा गहरा प्रेम प्रसंग था, जो सीधे भारत की किस्मत से जुड़ गया।
कैम्ब्रिज की कॉफ़ी से दिल्ली के सिंहासन तक
कहानी शुरू होती है कैम्ब्रिज के एक रेस्तरां से, जहाँ इटली की एक सीधी-साधी कन्या को भारत के एक भावी प्रधानमंत्री से प्यार हो जाता है। लेकिन ठहरिए! यह केवल दो दिलों का मिलन नहीं था, बल्कि यह तो भारत के 140 करोड़ लोगों का भाग्य बदलने वाला ‘दिव्य योग’ था। क्या उस समय राजीव जी ने चाय के घूंट के साथ सोनिया जी को कांग्रेस पार्टी की कमान और भारत पर ‘शासन करने का पवित्र अधिकार’ भी सौंप दिया था? यह प्रेम ही तो था, जिसने एक विदेशी नागरिकता वाली महिला को रातों-रात भारतीय संस्कृति, राजनीति और ‘त्याग’ की मूरत बना दिया।
सच्चा ‘प्रेम’ या सत्ता का मास्टरस्ट्रोक?
लेख में बड़ी ही तरलता से समझाया गया है कि कैसे यह प्रेम कहानी भारत के प्रति “गहरी आत्मीयता” में बदल गई। वाह! क्या गज़ब का कायाकल्प है। आम इंसानों का प्यार शादी और बच्चों तक सिमट जाता है, पर यहाँ प्यार इतना बढ़ा कि 10 जनपथ देश का सबसे शक्तिशाली पता बन गया। जब 2004 में प्रधानमंत्री पद छोड़ने की बात आई, तो उसे ‘अंतरआत्मा की आवाज’ और ‘प्रेमजन्य त्याग’ का नाम दिया गया। डाक्टर मनमोहन सिंह जी को कुर्सी पर बैठाकर पीछे से रिमोट कंट्रोल चलाना—अहा, प्रेम का ऐसा अनूठा रूप इतिहास में कहाँ मिलेगा!
दरबारी पत्रकारिता का नया ‘रोमांटिक’ कीर्तिमान
पत्रकारिता का यह ‘बॉलीवुडिया’ अवतार वाकई काबिले-तारीफ़ है। देश में चुनाव, गठबंधन और नीतियां तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन जनता को असली ज़रूरत तो यह जानने की है कि सोनिया जी की इस ‘लव स्टोरी’ ने देश पर कितना बड़ा उपकार किया है। ‘काक-वाणी’ सुझाव देती है कि इस महान प्रेम गाथा पर जल्द ही एक महाकाव्य लिखा जाना चाहिए, जिसका शीर्षक हो—’इटली से आया मेरा पिया, और भारत को अपना बना लिया।’
खैर, जब प्रेम की ऐसी पटकथाएँ दरबारी मीडिया लिखता है, तो बेचारी राजनीति भी कोने में बैठकर शरमा जाती है!
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