सिनेमा सिर्फ डायलॉग और गानों से ही बात नहीं करता, कभी-कभी किरदार के बदन पर सजे कपड़े वो सब कह जाते हैं जो बड़े-बड़े शब्द भी नहीं कह पाते। जब बात भारत-पाकिस्तान के विभाजन (Partition) की भयानक त्रासदी की हो, तो हिंदी सिनेमा ने इस ऐतिहासिक दर्द को दिखाने के लिए ‘फैशन’ को अपना सबसे बड़ा जरिया बनाया है। ‘काक-वाणी’ के इस खास बॉलीवुड तड़के में आज हम बात करेंगे कि कैसे फिल्मों ने पहनावे और कपड़ों के जरिए 1947 की उस टीस को पर्दे पर जिंदा रखा है।
रंगों का सफर: खुशहाली से मलबे तक
विभाजन पर बनी फिल्मों में कपड़ों के रंग बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। करण जौहर की भव्य फिल्म Kalank को ही ले लीजिए। विभाजन से ठीक पहले की खुशहाली को दिखाने के लिए किरदारों को भारी कढ़ाई वाले कुर्ते, लखनऊई चिकनकारी, अनारकली सूट और शानदार कश्मीरी शॉल में दिखाया गया। लेकिन जैसे ही दंगों और बंटवारे का खौफनाक मंजर स्क्रीन पर आता है, सारे चटकीले रंग अचानक गायब हो जाते हैं। किरदारों को सफेद, मटमैले, फटे और धूल से सने कपड़ों में दिखाया जाता है, जो उनके उजड़े हुए आशियाने और छन चुकी खुशियों को बयां करते हैं।
फुलकारी और खादी की जुगलबंदी
अविभाजित पंजाब के उस दौर को बिना ‘फुलकारी’ और ‘सिंधि कढ़ाई’ के सोच पाना भी नामुमकिन है। ‘पिंजर’, ‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘गदर: एक प्रेम कथा’ जैसी फिल्मों में खादी के सादे कुर्ते, सूती साड़ियां और पारंपरिक रंग-बिरंगे दुपट्टों का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ। यह पहनावा केवल एक स्टाइल स्टेटमेंट नहीं था, बल्कि यह उस मिट्टी की सोंधी खुशबू और समृद्ध संस्कृति को दर्शाता था जो विभाजन की लकीर खिंचते ही रातों-रात पराई होने वाली थी। इन फिल्मों में पहनावे का सादापन ही दर्शकों के दिलों में सीधा उतर जाता है।
गहनों में छिपा विस्थापन का दर्द
बंटवारे के दौर में महिलाओं के भारी झुमके, मांग टीका और चांदी के पारंपरिक गहने केवल उनकी खूबसूरती बढ़ाने के लिए नहीं थे। फिल्मों में अक्सर दिखाया गया है कि कैसे ये कीमती गहने विस्थापन के समय उनकी आखिरी जमा-पूंजी और उम्मीद बनकर उनके साथ चलते थे। Kalank में आलिया भट्ट के शाही गहने हों या पुरानी फिल्मों में सादगी भरा अंदाज, फैशन ने हमेशा विभाजन के उस दौर की रूह को पकड़ने की सफल कोशिश की है।
डिजाइनर्स की सुई-धागे वाली मेहनत
इस ऐतिहासिक दौर को पर्दे पर हूबहू उतारना किसी चुनौती से कम नहीं होता। फिल्म डिजाइनर्स पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और उस जमाने के साहित्यों को खंगालते हैं ताकि कपड़ों में प्रामाणिकता बनी रहे। सिंथेटिक कपड़ों की जगह शुद्ध सूती, मलमल और सिल्क का इस्तेमाल किया जाता है।
तो अगली बार जब आप विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी कोई फिल्म देखें, तो सिर्फ उसकी कहानी पर नहीं, बल्कि किरदारों के कपड़ों पर भी गौर कीजिएगा। वे कपड़े चीख-चीख कर इतिहास की गवाही दे रहे होते हैं!
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