खाली मुट्ठी और अनोखी सरसों: जीवन का सच बताने वाली लोककथा

बहुत समय पहले की बात है, एक शांत और सुंदर गाँव में करुणा नाम की एक गरीब महिला रहती थी। उसका एकमात्र सहारा उसका पाँच साल का बेटा, माधव था। माधव करुणा की आँखों का तारा और उसके जीने की एकमात्र वजह था। लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक तेज बीमारी के कारण माधव की मृत्यु हो गई।

करुणा का पूरा संसार उजड़ गया। वह अपने मृत बेटे के शरीर को अपनी छाती से लगाए गाँव-गाँव भटकने लगी। वह हर किसी के सामने रोती-बिलखती और भीख मांगती कि कोई उसके बच्चे को जीवित कर दे। गाँव के लोगों को उस पर बहुत तरस आता, लेकिन मौत का भला क्या इलाज हो सकता था?

संत की अनोखी शर्त

तभी गाँव के एक बुजुर्ग ने उसे ढांढस बंधाया और कहा, “तुम जंगल की कुटिया में रहने वाले महात्मा आनंद के पास जाओ। वे बहुत पहुंचे हुए संत हैं, शायद वे तुम्हारी मदद कर सकें।”

आशा की एक आखिरी किरण लेकर करुणा भागती हुई महात्मा के चरणों में गिर पड़ी और रोते हुए बोली, “हे महात्मा! मेरे लाल को जीवित कर दीजिए। इसके बिना मैं भी मर जाऊँगी।”

महात्मा ने करुणा के गहरे दुख को समझा। उन्होंने अत्यंत करुणा भाव से उसकी ओर देखा और कहा, “पुत्री, शांत हो जाओ। मैं तुम्हारे पुत्र को जीवित कर सकता हूँ। लेकिन इसके लिए तुम्हें एक मुट्ठी सरसों के दाने लाकर मुझे देने होंगे।”

करुणा खुश हो गई और जाने लगी, तभी महात्मा ने एक शर्त जोड़ते हुए कहा, “रुको! सरसों के दाने केवल उसी घर से होने चाहिए, जहाँ कभी किसी की असमय या सामान्य मृत्यु न हुई हो।”

सत्य की खोज में भटकाव

करुणा उम्मीद से भरी गाँव की ओर दौड़ी। वह सबसे पहले घर के दरवाजे पर गई और बोली, “मुझे एक मुट्ठी सरसों दे दो, इससे मेरा बच्चा जी उठेगा।” गृहस्वामी ने तुरंत अंदर जाकर सरसों लाकर दे दी।

तब करुणा ने महात्मा की शर्त के अनुसार पूछा, “क्या आपके घर में कभी किसी की मृत्यु हुई है?”

यह सुनते ही गृहस्वामी की आँखों में आँसू आ गए। उसने भारी आवाज में कहा, “हाँ बहन! पिछले ही साल मेरे बूढ़े पिता हमें छोड़कर चले गए।”

करुणा ने उदास मन से सरसों वापस कर दी और दूसरे घर गई। वहाँ उसे पता चला कि कुछ महीने पहले उनकी जवान बेटी की मृत्यु हो गई थी। वह तीसरे, चौथे, सौवें घर गई… लेकिन पूरे गाँव में एक भी ऐसा घर नहीं मिला जहाँ कभी किसी की मृत्यु न हुई हो। किसी के पिता, किसी की माँ, किसी की पत्नी तो किसी के जवान बेटे की मृत्यु हो चुकी थी।

जीवन का कड़वा सच

शाम ढलते-ढलते करुणा थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गई। अपनी खाली मुट्ठी को देखते ही उसके मन का भ्रम टूट गया। उसे अचानक बोध हुआ कि मृत्यु सृष्टि का अंतिम और अटल सत्य है। जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उसका अंत निश्चित है। दुख केवल उसका अकेले का नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति का है।

वह शांत मन से महात्मा आनंद के पास वापस लौटी, लेकिन इस बार उसके हाथ खाली थे और आँखों में आँसू नहीं, बल्कि एक गहरा ठहराव था। उसने महात्मा के चरणों में सिर झुकाया और कहा, “प्रभु! मुझे जीवन का सबसे बड़ा सच मिल गया है। अब मेरे भीतर का मोह नष्ट हो चुका है।”

सीख

यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें सिखाती है कि संसार में परिवर्तन और मृत्यु ही एकमात्र ध्रुव सत्य हैं। किसी भी प्रियजन के जाने का दुख असहनीय होता है, लेकिन मोह में पड़कर इस सत्य को न स्वीकारना हमारे दुख को और बढ़ा देता है। सुख और दुख, जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो चला गया, उसे सम्मानपूर्वक विदा करना और वर्तमान में जीना ही जीवन का असली नाम है।

कागा जी