खोखले बांसों का मधुर संगीत और हमारा ‘ठोस’ लोकतंत्र

वाह! क्या खोजी पत्रकारिता है। ‘स्क्रॉल’ महोदय ने एक महान वैश्विक रहस्योद्घाटन किया है कि भारत के खोखले राजनीतिक दल एक ठोस लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर सकते। इस अद्भुत और क्रांतिकारी खोज के लिए उन्हें पत्रकारिता का नोबेल पुरस्कार तो मिलना ही चाहिए। आखिर हमें तो आज तक यही लगता था कि हमारे राजनीतिक दल गंगाजल जैसे पवित्र, लोहे जैसे मजबूत और राजा हरिश्चंद्र जैसे सत्यवादी हैं। अब जाकर पता चला कि वे अंदर से वैसे ही खोखले हैं जैसे शादी का कोई भव्य नकली स्टेज, जो बाहर से तो स्वर्ग जैसा दिखता है लेकिन पीछे से फटी हुई बल्लियों के सहारे टिका होता है।

खोखलेपन का भव्य उत्सव: विचारधारा गई तेल लेने

हमारे देश के राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इनमें विचारधारा नाम का कोई वायरस नहीं होता। सुबह एक नेताजी समाजवाद की कसम खाते हैं, दोपहर में पूंजीवाद की गोद में बैठते हैं और शाम होते-होते ‘धर्मनिरपेक्षता’ का चोला उतारकर किसी ‘कट्टरपंथी’ खेमे में आरती उतारते नजर आते हैं। इस कला को हमारे यहाँ ‘अवसरवादिता’ नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक लचीलापन’ कहा जाता है। जब राजनीतिक दलों की अपनी कोई वैचारिक नींव ही नहीं है, तो वे लोकतंत्र की नींव को कैसे मजबूत करेंगे? उनके पास न तो कोई आंतरिक चुनाव हैं और न ही कोई नैतिक मूल्य, बस है तो केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘पीआर स्टंट’ का चकाचौंध।

परिवारवाद और ‘प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनियां

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे दल इतने खोखले क्यों हैं? क्योंकि वे राजनीतिक दल नहीं, बल्कि पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां हैं। यहाँ योग्यता का पैमाना आपका काम नहीं, बल्कि आपका ‘सरनेम’ होता है। एक पार्टी में सिर्फ एक ही परिवार का राज चलता है, तो दूसरी पार्टी में एक ‘सुप्रीम लीडर’ का हुक्म अंतिम सत्य होता है। आंतरिक लोकतंत्र? वह तो केवल चुनाव आयोग को दिखाने वाले कागजी दस्तावेजों में शोभा देता है। जब पार्टी के अंदर ही लोकतंत्र की हत्या हर रोज की जाती है, तो वे देश में लोकतंत्र की स्थापना कैसे करेंगे? यह तो वही बात हुई कि कोई पूरी तरह गंजा व्यक्ति दूसरों को घने बाल उगाने का चमत्कारी तेल बेच रहा हो।

काक-वाणी का अंतिम सत्य

इस पूरे खेल में जनता ही हमेशा ‘मूर्खराज’ बनती है। हमारे लिए लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार उंगली पर स्याही लगवाने और मुफ्त के वादों की रेवड़ियां बटोरने का त्योहार बनकर रह गया है। खोखले बांसों से केवल शोर मचाने वाली बांसुरी बजाई जा सकती है, उनसे मजबूत पुल नहीं बनाए जा सकते। लेकिन घबराइए मत, जब तक हमारी राजनीति में यह रंगारंग तमाशा चालू है, ‘काक-वाणी’ जैसी कौवों की सभाएं अपना राग अलापती रहेंगी और आप इस खोखले तमाशे पर ‘ठोस’ तालियां बजाते रहेंगे।


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कागा जी