गोरे रंग का ‘डेंजरस’ बुखार: अंकुर राठी ने खोली बॉलीवुड के फेयर-स्किन बायस की पोल!

बॉलीवुड की चमक-धमक के पीछे कई ऐसे अंधेरे कोने हैं, जिन पर अक्सर बात करने से लोग कतराते हैं। लेकिन ‘थप्पड़’, ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ और ‘अनदेखी’ जैसी हिट सीरीज में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाले शानदार एक्टर अंकुर राठी ने अब एक ऐसे ही कड़वे सच पर करारा प्रहार किया है। अंकुर ने भारतीय सिनेमा में गोरी रंगत (Fair-Skin Bias) के प्रति दीवानगी को बेहद ‘खतरनाक’ करार दिया है और सीधे तौर पर बॉलीवुड की पुरानी मानसिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गोरी रंगत का फितूर और हॉलीवुड का आईना

हाल ही में दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में अंकुर राठी ने बेहद बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा में आज भी कलाकारों को उनके टैलेंट से ज्यादा उनकी स्किन टोन के आधार पर आंका जाता है। गोरे रंग को ही सुंदरता और सफलता का अंतिम पैमाना मान लेना हमारे समाज और फिल्म इंडस्ट्री दोनों के लिए एक धीमा जहर है।

अंकुर ने पश्चिम (Hollywood) का उदाहरण देते हुए बॉलीवुड को करारा आईना दिखाया। उन्होंने कहा, “पश्चिम में लुपिता न्योंगो (Lupita Nyong’o) जैसी सांवली और बेहद प्रतिभाशाली ऑस्कर विजेता अभिनेत्री की खूबसूरती और कला की पूजा की जाती है। वहां उनके सांवले रंग को नहीं, बल्कि उनकी पर्सनालिटी को सेलिब्रेट किया जाता है। लेकिन हमारे यहां? हमारे सिनेमा में आज भी फेयरनेस का ही बोलबाला है, जो बेहद निराशाजनक है।”

क्यों खतरनाक है यह ‘गोरा’ ढोंग?

अंकुर राठी का मानना है कि सिनेमा समाज का आइना होता है। जब बड़े पर्दे पर केवल गोरे चेहरों को ही हीरो-हीरोइन के रूप में प्राथमिकता दी जाती है, तो देश का आम युवा हीन भावना का शिकार होने लगता है। यह फेयर-स्किन बायस न केवल नए और प्रतिभाशाली सांवले कलाकारों का आत्मविश्वास तोड़ता है, बल्कि दर्शकों के दिमाग में भी ‘खूबसूरती’ की एक गलत और खतरनाक परिभाषा तय कर देता है।

काक-वाणी की राय: क्या बदलेगी बॉलीवुड की सोच?

अंकुर राठी का यह बयान उस सोच पर सीधा हमला है जो सदियों से हमारे देश में पैर पसारे बैठी है। ‘काक-वाणी’ भी यही सवाल उठाती है कि जब दुनिया सांवले और गहरे रंगों की खूबसूरती को सलाम कर रही है, तो हमारा बॉलीवुड अब भी ‘फेयरनेस क्रीम’ वाली 90 के दशक की सोच में क्यों अटका हुआ है?

अंकुर की इस ‘कड़क वाणी’ ने इंडस्ट्री के बड़े-बड़े मेकर्स को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या हमारा सिनेमा इस रंगभेद के तिलस्म को तोड़ पाएगा, या फिर गोरे रंग का यह ‘डेंजरस’ खुमार यूं ही जारी रहेगा!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी