चुनाव आयोग का बहाना और ‘इंडिया’ का याराना: हार से पहले विलाप की तैयारी!

काक-वाणी की विशेष चौपाल में आपका स्वागत है। आज हमारे कौवे भाई ने डाल पर बैठकर जो राग छेड़ा है, उसका सुर सीधे देश के ‘महागठबंधन’ यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की जुगलबंदी से मिल रहा है। खबर आई है कि चुनाव आयोग (ECI) के खिलाफ हमारे विपक्ष के सूरमाओं ने एक बार फिर अपनी ‘अखंड एकता’ का प्रदर्शन किया है। जो नेता राज्यों में सीटों के बंटवारे पर एक-दूसरे की धोती खींचने को आमादा रहते हैं, वे चुनाव आयोग का नाम सुनते ही ऐसे गले मिलते हैं जैसे बरसों पुराने बिछड़े भाई हों।

फेविकोल से मजबूत है ‘शिकायत’ का गोंद

यह वाकई भारतीय राजनीति का आठवां अजूबा है। पंजाब और दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी नूरा-कुश्ती खेल रहे हैं, बंगाल में ममता दीदी अकेले ही सबको ‘खेला’ दिखा रही हैं, लेकिन जैसे ही बात चुनाव आयोग को घेरने की आती है, सब फेविकोल के मजबूत जोड़ की तरह चिपक जाते हैं। आखिर विपक्षी एकता का असली फेविकोल कोई कॉमन मिनिमम प्रोग्राम नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की शिकायतें ही हैं! जब तक आयोग सक्रिय रहेगा, तब तक विपक्ष को एकजुट होने का और चाय-समोसे पर चर्चा करने का बहाना मिलता रहेगा। राजनीति के इस अनोखे रंगमंच पर ‘हार की पूर्व-तैयारी’ को ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहा जाता है।

कानूनी दांव-पेंच या केवल समय बिताने का साधन?

अब इस ‘यूनाइटेड’ कुनबे ने नया कानूनी और राजनीतिक खाका तैयार करने की ठानी है। सुना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटेंगे, लंबे-चौड़े ज्ञापन सौंपेंगे और ईवीएम को एक बार फिर लोकतंत्र का सबसे बड़ा विलेन साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाएंगे। यह तो वही बात हुई कि परीक्षा हॉल में घुसने से पहले ही छात्र चिल्लाने लगे कि ‘कॉपी जांचने वाला ही बिका हुआ है, इसलिए मेरे फेल होने की स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी है।’

वाह! क्या अद्भुत दूरदर्शिता है। यदि किसी राज्य में चुनाव जीत गए तो ‘जनता की समझदारी और ईवीएम की ईमानदारी’, और जहां हार गए वहां ‘चुनाव आयोग की सेटिंग’। इस दोहरे मापदंड के लिए तो ऑस्कर का एक नया कैटगरी बनाना चाहिए।

खैर, ‘इंडिया’ गठबंधन की इस नई कानूनी जंग को देखकर वकीलों के चेहरे पर चमक आ गई होगी। राजनीतिक मोर्चे पर भले ही इनके पास कोई ठोस विकल्प न हो, लेकिन चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करके ये खुद को ‘सच्चा लोकतंत्र रक्षक’ साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। ‘काक-वाणी’ का तो यही कहना है कि जनाब, जनता के बीच जाने से ज्यादा समय अगर कोर्ट के चक्करों और प्रेस कॉन्फ्रेंसों में बिताएंगे, तो परिणाम आने पर फिर से नए बहाने ढूंढने के लिए एक और ‘असाधारण बैठक’ बुलानी पड़ेगी।


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कागा जी