हार का एडवांस इंश्योरेंस: ईवीएम का भूत, चुनाव आयोग पर गुस्सा और बैलेट पेपर की ‘पुरानी यादें’!

लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव आने वाला है, और हमारे विपक्षी शूरवीरों ने युद्ध के मैदान में उतरने से पहले ही रेफरी और खेल के नियमों पर सवाल उठाने की अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखा है। हाल ही में ‘इंडी’ गठबंधन की एक भव्य बैठक हुई। इस बैठक में इस बात पर माथापच्ची नहीं हुई कि जनता का दिल कैसे जीता जाए, बल्कि सारा जोर इस बात पर था कि अगर जनता ने दिल नहीं दिया, तो उसका ठीकरा किस पर फोड़ा जाए। और हमेशा की तरह, बकरा मिल ही गया – चुनाव आयोग और नए चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार!

विलेन नंबर वन: ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग

गठबंधन की बैठक में सबसे पहला और क्रांतिकारी प्रस्ताव यह पारित हुआ कि चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत पद से हटाया जाए। आखिर क्यों? क्योंकि विपक्ष की डिक्शनरी में ‘निष्पक्ष चुनाव’ का सीधा और सरल मतलब केवल वही होता है जिसमें वे खुद जीत रहे हों। अगर नतीजों में थोड़ी भी गड़बड़ (यानी विपक्ष की हार) की आशंका हो, तो समझ लीजिए कि पूरी चुनाव मशीनरी ही बिकी हुई है। ‘काक-वाणी’ के सूत्रों के अनुसार, गठबंधन के नेताओं का मानना है कि चुनाव आयोग के दफ्तरों में ईवीएम को वश में करने के लिए कोई विशेष जादुई अनुष्ठान चल रहा है। अब इस जादू-टोने से बचने का एकमात्र तरीका यही है कि चुनाव कराने वालों को ही सस्पेंड करने की मांग की जाए और उनके खिलाफ रैलियां निकाली जाएं।

बैलेट पेपर का ‘रोमांटिक’ दौर और बूथ कैप्चरिंग की यादें

बैठक का दूसरा सबसे बड़ा और प्रगतिशील सुझाव था – “बैलेट पेपर लाओ, देश बचाओ”। वाह! जब पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्पेस टेक्नोलॉजी की बातें कर रही है, हमारा गठबंधन हमें 90 के दशक के उस ‘रोमांटिक’ दौर में ले जाना चाहता है जहां मतपेटियां नालों में तैरती हुई मिलती थीं। बैलेट पेपर की मांग असल में उस स्वर्णिम काल की याद दिलाती है जब ‘बूथ कैप्चरिंग’ को एक सम्मानित खेल माना जाता था और मतपेटियों को लूटने के लिए बाहुबलियों को बकायदा ‘रोजगार’ मिलता था। डिजिटल इंडिया के इस दौर में कागज के टुकड़ों पर मुहर लगाने की यह छटपटाहट वाकई काबिले-तारीफ है।

चित भी मेरी, पट भी मेरी!

कुल मिलाकर, ‘इंडी’ गठबंधन ने अपनी चुनावी रणनीति का ब्लूप्रिंट बिल्कुल साफ कर दिया है। रणनीति बेहद सरल है: अगर वे चुनाव जीत गए, तो यह ‘जनता की क्रांति’ और ‘लोकतंत्र की जीत’ होगी। लेकिन, अगर वे हार गए, तो ईवीएम हैक थी, ज्ञानेश कुमार मिले हुए थे, और बैलेट पेपर न होना ही सबसे बड़ा पाप था। इसे कहते हैं ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी, और सिक्का मेरे बाप का’। अब देखना यह है कि देश की जनता इस रोतलू विलाप पर सहानुभूति की दो बूंदें टपकाती है या फिर इनके बहानेबाजी के गुब्बारे की हवा निकाल देती है।


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कागा जी