वाह रे हमारा महान लोकतंत्र! जहाँ जनता को अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर मार्च निकालना पड़ता है और खुद को ‘निष्पक्ष’ कहने वाले संस्थान को अपनी सुरक्षा के लिए कंक्रीट की दीवारें खड़ी करनी पड़ती हैं। ‘द प्रिंट’ की खबर के मुताबिक, चुनाव आयोग (ECI) के मुख्यालय के बाहर सुरक्षा व्यवस्था ऐसी चाक-चौबंद कर दी गई है, मानो अंदर कोई अति-गोपनीय परमाणु फॉर्मूला सुरक्षित रखा हो। वजह बेहद गंभीर है—’इंडिया’ (INDIA) गठबंधन वाले ‘सर’ (SIR – Systemic Issues / Saheb’s Regime) के खिलाफ मोर्चा खोलने जा रहे हैं। अब जब बात ‘सर’ की प्रतिष्ठा पर बन आए, तो आयोग का ढाल बनकर खड़े होना तो लाजमी है!
लोकतंत्र के प्रहरी का ‘अभेद्य किला’
चुनाव आयोग का दफ्तर इन दिनों किसी मध्ययुगीन किले जैसा नजर आ रहा है। चारों तरफ पुलिस बल, वाटर कैनन और बैरिकेड्स की ऐसी कलात्मक सजावट की गई है कि देखकर किसी का भी मन राष्ट्रभक्ति से भर जाए। ऐसा लगता है कि देश की सबसे बड़ी चुनौती अब स्वतंत्र चुनाव कराना नहीं, बल्कि खुद को विपक्ष के तीखे और कड़वे सवालों से बचाना है। आखिर विपक्ष की हिम्मत कैसे हुई कि वह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाए? क्या वे नहीं जानते कि आयोग इन दिनों कितना ‘व्यस्त’ है? व्यस्तता भी कोई मामूली नहीं है—विपक्ष के भाषणों पर माइक्रोस्कोप लेकर नोटिस तैयार करने और सत्तापक्ष की रैलियों पर ‘गांधारी’ मोड में जाने की व्यस्तता!
‘सर’ (SIR) का खौफ और बेबस आयोग
इस पूरे ड्रामे में ‘SIR’ का किरदार सबसे दिलचस्प है। विपक्ष का साफ आरोप है कि देश की चुनाव प्रणाली अब ‘सर’ यानी सत्ता के शीर्ष इशारों पर नाच रही है। अब जब विपक्ष इस ‘सर’ संस्कृति के खिलाफ मार्च निकाल रहा है, तो आयोग की घबराहट समझी जा सकती है। सोचिए, अगर विपक्ष का शोर अंदर वातानुकूलित कमरों में बैठे साहबान के कानों तक पहुंच गया, तो उनकी गहरी और मीठी नींद टूट जाएगी! इसलिए कानों में सरकारी रुई और दफ्तर के बाहर लोहे की जंजीरें डालना बेहद जरूरी हो गया है।
काक-वाणी का कड़वा सच
काक-वाणी का मानना है कि इतनी भारी-भरकम सुरक्षा की जरूरत आखिर है क्यों? अगर आयोग वाकई पाक-साफ है, तो उसे विपक्ष का स्वागत गुलाब के फूलों और चाय-समोसे के साथ करना चाहिए था। लेकिन यहाँ तो डर का माहौल है। डर इस बात का नहीं कि चुनाव की साख गिर रही है, बल्कि डर इस बात का है कि कहीं कोई सचमुच निष्पक्षता का पैमाना न मांग बैठे। खैर, जनता खिड़की से यह तमाशा देख रही है और मंद-मंद मुस्कुरा रही है। जब लोकतंत्र के रखवाले ही खुद को बचाने के लिए पहरेदार बिठाने लगें, तो समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी की पूरी कड़ाही ही काली हो चुकी है!
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