प्रिय देशवासियों और राजनीति के शौकीनों, ‘काक-वाणी’ के इस विशेष बुलेटिन में आपका स्वागत है। आज हमारे निशाने पर हैं कांग्रेस के मुख्य शब्द-शिल्पी, अंग्रेजी के प्रकांड पंडित और पार्टी के ‘थिंक-टैंक’ जयराम रमेश जी। हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में देश के ‘पॉलिटिकल मूड’ का ऐसा सटीक पोस्टमार्टम किया है कि मौसम विभाग वाले भी अपनी नौकरी खतरे में महसूस कर रहे हैं। जयराम बाबू के अनुसार, देश की हवा बदल रही है, और यह हवा एसी कमरों से नहीं बल्कि देश की सड़कों और यूनिवर्सिटी के कैंपस से चल रही है।
छात्रों का गुस्सा और साहेब की ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ इमेज
जयराम जी ने बड़ी ही मासूमियत से याद दिलाया कि देश का युवा अब केवल सोशल मीडिया पर रील बनाने में व्यस्त नहीं है। वह सड़कों पर है, विरोध कर रहा है। कभी नीट की परीक्षा लीक होने पर, तो कभी नौकरियों के लाले पड़ने पर। लेकिन हमारे देश की खूबसूरती देखिए! छात्र लाठियां खा रहे हैं और हमारे राजनीतिक मौसम वैज्ञानिक इसे ‘बदलते मूड’ का संकेत बताकर अपने विश्लेषण की पीठ थपथपा रहे हैं।
वैसे, जयराम जी ने प्रधानमंत्री मोदी की ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ वाली थ्योरी पर भी करारा तंज कसा। जब साहेब खुद को भगवान का सीधे भेजा हुआ दूत समझने लगें, तो भला विपक्ष क्यों न उन्हें धरती की हकीकत से रूबरू कराए? जयराम जी की मानें तो अब साहेब की ‘अजेय’ छवि पर जनता के सवालों का जंग लग चुका है, और इसे मिटाने के लिए अब कोई भी राजनीतिक सैनिटाइजर काम नहीं आ रहा है।
राहुल बाबा का ‘मूड’ और जयराम की दूरबीन
इंटरव्यू में असली मजा तब आया जब बात राहुल गांधी पर पहुंची। जयराम रमेश जी ने जिस तरह से राहुल गांधी के ‘पॉलिटिकल इवोल्यूशन’ को समझाया, उसे देखकर लगता है कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत भी शरमा जाए। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने तक, राहुल बाबा के मूड में जो बदलाव आया है, उसे जयराम जी देश का नया ‘पॉलिटिकल नरेटिव’ बता रहे हैं। वैसे यह बात सच भी है, जब तक नेताजी का मूड ठीक न हो, तब तक पार्टी प्रवक्ताओं का मूड कैसे बनेगा? जयराम जी ने बड़ी चतुराई से स्थापित कर दिया कि देश अब एक ‘एकछत्र राज’ से थककर ‘मोहब्बत की दुकान’ की फ्रैंचाइज़ी खोलने को बेताब है।
सदाबहार जयराम और अंतहीन विश्लेषण
अंत में, ‘काक-वाणी’ बस यही कहना चाहती है कि चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, छात्र सड़कों पर अपनी किस्मत के लिए संघर्ष करते रहेंगे, लेकिन जयराम रमेश जी के अंग्रेजी के भारी-भरकम शब्द और उनका यह दार्शनिक अंदाज कभी नहीं बदलेगा। छात्रों के आंसुओं और जनता के गुस्से में अपनी पार्टी की संजीवनी तलाशना ही आज की भारतीय राजनीति का असली ‘मूड’ है। जय हो इस दिव्य दृष्टि की!
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