टूटे चिराग की लौ

रामपुर के एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक वृद्ध मूर्तिकार रहता था। मिट्टी और पत्थरों में जान फूंक देना उसकी कला की सबसे बड़ी खासियत थी। माधव के जीवन का केवल एक ही अंतिम सपना था—वह अपने गाँव के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए एक मुफ़्त पाठशाला बनाना चाहता था। इस सपने को पूरा करने के लिए उसने सालों की मेहनत के बाद एक अत्यंत दुर्लभ और सुंदर मूर्ति तराशना शुरू किया। इस मूर्ति को शहर की वार्षिक प्रदर्शनी में बेचा जाना था, जिससे मिलने वाली राशि से पाठशाला का निर्माण होना था।

अचानक आया दुखों का पहाड़

मूर्ति लगभग पूरी होने ही वाली थी कि एक दुखद हादसा हुआ। अत्यधिक परिश्रम और बढ़ती उम्र के कारण माधव के हाथों में अचानक गंभीर कंपन शुरू हो गया। डॉक्टरों ने स्पष्ट कह दिया कि उसे स्नायु तंत्र की बीमारी हुई है और अब उसके हाथ कभी भी बारीक काम नहीं कर पाएंगे। यह खबर सुनते ही माधव की पूरी दुनिया बिखर गई। उसकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसने अपने 12 वर्षीय पोते रोहन को सीने से लगाते हुए रोते हुए कहा, “बेटा, लगता है उन अनाथ बच्चों का भविष्य अब अँधेरे में ही रह जाएगा। मेरे कांपते हाथ अब छेनी और हथौड़ी नहीं संभाल सकते।”

इरादों की नई उफ़ान

रोहन ने अपने दादाजी के आंसू पोंछे और उनके कांपते हाथों को चूमकर कहा, “दादाजी, हुनर हाथों में नहीं, आपकी आत्मा और आपके विश्वास में बसता है। हाथ कांप सकते हैं, लेकिन आपका हौसला तो नहीं कांप सकता ना? आप हार मत मानिए, मैं आपके हाथ बनूँगा।”

छोटे रोहन के इन शब्दों ने निराश माधव के भीतर बुझी हुई उम्मीद की चिंगारी को फिर से भड़का दिया। माधव ने तय कर लिया कि वह अपनी शारीरिक कमजोरी के आगे घुटने नहीं टेकेगा। अगले ही दिन से माधव ने रोहन के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। माधव उसे दिशा और मार्गदर्शन देता, और रोहन के हाथों को थामकर धीरे-धीरे छेनी चलाता। जब भी दर्द के कारण माधव के हाथ थरथराते, वह आँखें बंद करके अपनी अंतरात्मा में भगवान का ध्यान करता और अपने संकल्प को याद करता।

सफलता का जगमगाता चिराग

महीनों के अथक प्रयास और पीड़ा को सहने के बाद आखिर वह मूर्ति बनकर तैयार हो गई। प्रदर्शनी के दिन जब माधव की मूर्ति से पर्दा हटाया गया, तो वहाँ मौजूद सभी कला प्रेमियों की साँसें थम गईं। उस मूर्ति में केवल शिल्पकारी ही नहीं, बल्कि एक इंसान के अटूट संघर्ष, असीम प्रेम और भक्ति के भाव साफ झलक रहे थे। वह प्रदर्शनी की सबसे अमूल्य कलाकृति साबित हुई। शहर के एक बड़े दानवीर ने उस मूर्ति को बहुत बड़ी बोली लगाकर खरीदा, जिससे न केवल पाठशाला बल्कि बच्चों के लिए एक विशाल पुस्तकालय का बजट भी जमा हो गया।

पाठशाला के उद्घाटन के दिन जब गाँव के बच्चे हँसते-खिलखिलाते अंदर प्रवेश कर रहे थे, तब माधव की आँखों में आंसू थे—लेकिन इस बार वे लाचारी के नहीं, बल्कि परम विजय और संतोष के आंसू थे।

कहानी से सीख

सीख: जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, और शरीर कितना भी कमजोर क्यों न पड़ जाए, अगर आपके इरादे पवित्र और इच्छाशक्ति मजबूत है, तो दुनिया की कोई भी रुकावट आपको सफलता पाने से नहीं रोक सकती। इंसान अपने शरीर से नहीं, बल्कि अपने संकल्पों से महान बनता है।

कागा जी