ड्रैगन की ‘पाठशाला’ और हमारे ‘बैकबेंचर’ नेता: गोखले साहब का ज्ञान

वाह! क्या अद्भुत और क्रांतिकारी मशविरा दिया है। हमारे पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले साहब ने फरमाया है कि भारत को चीन की घरेलू राजनीति का गहराई से अध्ययन करना चाहिए। अब भला इस बात की क्या तुक है? हमारे देश के नीति-निर्माताओं, रणनीतिकारों और खासकर टीवी एंकरों के पास पहले से ही पाकिस्तान की ‘कंगाली’ और मालदीव के ‘बायकॉट’ पर पीएचडी करने के बाद फुर्सत ही कहां है? वैसे भी, हमारे आम विमर्श के लिए चीन की राजनीति का मतलब सिर्फ लाल रंग का नक्शा, लद्दाख का तनाव और शाम को प्लेट में परोसा जाने वाला तीखा ‘वेज नूडल्स’ ही तो है। अब इसमें चीन के भीतर की राजनीति जैसी भारी-भरकम चीजें ढूंढना कूटनीतिक रूप से कितना थकाऊ काम है, यह गोखले जी को कौन समझाए!

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी बनाम पेकिंग यूनिवर्सिटी

गोखले साहब चाहते हैं कि हम चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसपी) के भीतर चल रही उठापटक को समझें। लेकिन उन्हें शायद अंदाजा नहीं है कि हमारे पास पहले से ही ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ नाम का एक वैश्विक संस्थान मौजूद है। वहां रोज़ सुबह यह सिद्ध कर दिया जाता है कि शी जिनपिंग आजकल डिप्रेशन में हैं, उनकी कुर्सी जाने वाली है और चीनी सेना केवल कागजी शेर है। जब इतनी सटीक ‘खुफिया’ जानकारी सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ मुफ्त में मिल रही हो, तो फिर चीनी दस्तावेजों को पढ़ने और बीजिंग के नीतिगत पन्नों को पलटने में अपना दिमाग क्यों खपाया जाए? वैसे भी, हमारी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा तो इसी बात पर टिका है कि घरेलू चुनाव में विपक्ष को कब और कैसे ‘चीन का एजेंट’ घोषित करना है।

एकतरफा ‘लाल आंख’ और कूटनीतिक चश्मा

सच तो यह है कि चीन में कोई लोकतंत्र नहीं है, वहां हर चुनाव से पहले कोई भव्य रैलियां नहीं होतीं और न ही वहां के विपक्षी नेताओं को जेल भेजने की कोई सनसनीखेज खबरें आती हैं। अब ऐसे उबाऊ देश की घरेलू राजनीति को पढ़कर हमारे राजनेता भला क्या सीखेंगे? हमारे नेताओं को तो उस राजनीति में मजा आता है जहां हर भाषण में सीमा पार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गर्जना हो और टीवी स्टूडियो में युद्ध छिड़ जाए। चीन की घरेलू नीति का अध्ययन करके हमें क्या मिलेगा? क्या हम वहां के नेताओं की तरह बिना किसी शोर-शराबे के चुपचाप देश के आर्थिक हितों को साधना सीख जाएंगे? नहीं बाबा नहीं, हमें काम से ज्यादा ‘नाम’ और गंभीर अध्ययन से ज्यादा ‘हेडलाइंस’ पसंद हैं।

इसलिए, गोखले साहब की इस सलाह को ठंडे बस्ते में डालना ही कूटनीतिक रूप से सबसे सुरक्षित कदम होगा। फिलहाल, हमें अपनी सारी ऊर्जा इस बात पर लगानी चाहिए कि अगले चुनाव में चीन को ‘लाल आंख’ दिखाने का चुनावी ड्रामा कैसे और बेहतर ढंग से किया जा सके। ड्रैगन को समझने के लिए दिमाग लगाने से कहीं बेहतर है कि हम चीनी ऐप्स बैन करके और उनके पुतले फूंककर अपनी देशभक्ति का ढोल पीटते रहें। आखिरकार, कूटनीति केवल कागजों पर नहीं, बल्कि टीवी स्क्रीन और चुनावी रैलियों में चमकनी चाहिए!


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कागा जी