भारतीय राजनीति के इतिहास में आज तक बड़े-बड़े घोटालों, अदालती नोटिसों और जनता की चीख-पुकार से किसी मंत्री की कुर्सी हिली हो, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। हमारे माननीय नेतागण ‘फेविकोल का मजबूत जोड़’ लगाकर अपनी कुर्सियों से इस कदर चिपके रहते हैं कि भूकंप भी आ जाए तो हिलने का नाम नहीं लेते। लेकिन धन्य हो बीबीसी की यह खबर, जिसने दुनिया को बताया कि जो काम बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां और कड़े कानून नहीं कर पाए, वो काम हमारे होनहार छात्र नेता अभिजीत टिपके और उनके चंद जांबाज ‘तिलचट्टों’ (कॉकरोच) ने कर दिखाया।
लोकतंत्र का नया हथियार: ‘पेस्ट कंट्रोल’ क्रांति
काक-वाणी की खोजी नजरों ने जब इस खबर को देखा, तो हमारी छाती गर्व से चौड़ी हो गई। सोचिए, जहां करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोपों पर भी मंत्री जी कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए ‘कानून अपना काम करेगा’ कहकर निकल जाते हैं, वहां कुछ रेंगते हुए कॉकरोच उनके इस्तीफे का कारण बन गए। अभिजीत टिपके ने यह साबित कर दिया कि भारतीय छात्र आंदोलन अब लाठी-डंडों, धरने और नारों के पुराने ढर्रे से आगे निकल चुका है। अब यह पूरी तरह से ‘बायोलॉजिकल’ और इको-फ्रेंडली हो गया है।
छात्रावासों की बदहाली, घटिया भोजन और गंदगी को उजागर करने के लिए जब यह अनोखा ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ शुरू हुआ, तो शायद मंत्री महोदय को लगा होगा कि यह भी रोज की तरह एक आम शिकायत है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि ये छोटे-छोटे तिलचट्टे उनके राजनीतिक करियर के सफेद कुर्ते पर इस कदर रेंगेंगे कि उन्हें अपनी मखमली गद्दी ही छोड़नी पड़ जाएगी।
जब रेंगते हुए जीवों के आगे ‘सिस्टम’ ने घुटने टेक दिए
आमतौर पर हमारे नेताओं की संवेदनशीलता और त्वचा इतनी मोटी होती है कि उस पर तीखे से तीखा कटाक्ष भी बेअसर रहता है। लेकिन इन कॉकरोचों में शायद कोई विशेष राजनीतिक चेतना थी। जैसे ही टिपके साहब ने इन्हें विरोध के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया, पूरी व्यवस्था में खलबली मच गई। मंत्री जी को शायद लगा होगा कि विधानसभा में विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करना तो फिर भी आसान है, लेकिन इन बिन-बुलाए छह पैरों वाले मेहमानों का सामना करना उनके वीआईपी प्रोटोकॉल के खिलाफ है।
इस ऐतिहासिक घटना के बाद, ‘काक-वाणी’ देश के अन्य मंत्रियों और अधिकारियों को एक मुफ्त सलाह देना चाहती है। कृपया अपने सरकारी बंगलों और दफ्तरों में तुरंत ‘पेस्ट कंट्रोल’ करवा लें। क्या पता कब, कौन सा छात्र संगठन आपकी किसी नाकामी के विरोध में आपके चैंबर में चींटियां, खटमल या टिड्डियां भेज दे! लोकतंत्र में अब केवल जनता के वोट ही नहीं, बल्कि ये छोटे-छोटे जीव भी सत्ता परिवर्तन की ताकत रखने लगे हैं। अभिजीत टिपके को इस अद्भुत ‘कीट-क्रांति’ के लिए लाल सलाम!
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