बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक गरीब लड़का अपनी वृद्ध माँ के साथ रहता था। माँ बहुत बीमार थी और उसका अंतिम समय निकट था। मृत्युशय्या पर लेटे हुए माँ ने माधव को अपने पास बुलाया और उसके हाथ में तीन मखमली पोटलियां थमा दीं।
माँ ने कमजोर आवाज में कहा, “बेटा, ये तीन पोटलियां तुम्हारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। जब तुम जीवन के सबसे कठिन दौर में हो, तब पहली पोटली खोलना। जब तुम सफलता के शिखर पर हो, तब दूसरी खोलना। और जब तुम्हें लगे कि तुम्हारा अंत समय निकट है, तब तीसरी पोटली खोलना।” इतना कहकर माँ ने दम तोड़ दिया। माधव माँ के जाने के दुख में फूट-फूटकर रोया।
पहली पोटली: संघर्ष और माटी का मोल
माँ के जाने के बाद माधव पाई-पाई को मोहताज हो गया। खाने के लाले पड़ गए। हताश होकर उसने माँ की दी हुई पहली पोटली खोली। उसमें मुट्ठी भर सूखी मिट्टी और एक पर्ची थी, जिस पर लिखा था – “मेहनत कर, इसी माटी से सोना उगेगा।” माधव को अपनी माँ की सीख समझ आ गई। उसने अपनी जमीन पर दिन-रात पसीना बहाया। कुछ ही वर्षों में उसकी बंजर जमीन फसलों से लहलहा उठी और वह गाँव का सबसे अमीर किसान बन गया।
दूसरी पोटली: अहंकार का अंत
अमीर बनते ही माधव के ठाठ-बाठ बदल गए। वह अहंकारी हो गया और गरीबों को तुच्छ समझने लगा। एक दिन उसे अपनी माँ की दूसरी पोटली की याद आई। उसने उत्सुकता में उसे खोला। उसमें एक छोटा सा दर्पण और एक पर्ची थी। पर्ची पर लिखा था – “दर्पण में अपनी सूरत नहीं, अपनी सीरत देख। याद रख, तू कल क्या था और आज क्या है।” इस सीख ने माधव की आँखें खोल दीं। उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने अपना धन और जीवन गरीबों की सेवा में लगा दिया।
तीसरी पोटली: जीवन का अंतिम सच
समय बीतता गया और माधव बूढ़ा हो गया। अब उसका अंतिम समय आ चुका था। वह बिस्तर पर लेटा अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहा था। तब उसने कांपते हाथों से तीसरी पोटली खोली। उसमें केवल थोड़ी सी राख थी और एक आखिरी पर्ची थी, जिस पर लिखा था – “राख ही अंतिम सच है। चाहे राजा हो या रंक, अंत में सबको इसी मिट्टी में मिल जाना है। साथ सिर्फ तुम्हारे अच्छे कर्म जाएंगे।”
माधव की आँखों से आंसू बह निकले। उसने संतोष की सांस ली क्योंकि उसने जीवन के आखिरी पड़ाव में केवल लोगों का भला किया था। उसने शांति से अपनी आँखें बंद कर लीं।
कहानी की सीख (Moral)
यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें सिखाती है कि इस संसार में मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है। धन, संपत्ति और अहंकार सब यहीं धरे रह जाते हैं। केवल हमारे द्वारा किए गए अच्छे कर्म और दूसरों को दिया गया प्रेम ही हमारे साथ जाता है। इसलिए जीवन में कभी घमंड नहीं करना चाहिए और हमेशा परोपकार का मार्ग चुनना चाहिए।