थरूर बाबू की अंग्रेजी और नेपाल का ‘बड़ा भाई’: कूटनीति या डिक्शनरी का खेल?

जब भी हमारे माननीय थरूर बाबू (यानी शशि थरूर जी) अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर मुंह खोलते हैं, तो सबसे पहले देश के आम नागरिक को अपने मोबाइल में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी खोलनी पड़ती है। इस बार उन्होंने भारत-नेपाल संबंधों पर ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई है कि कूटनीति के सारे पंडित बगलें झांकने लगे हैं। एनडीटीवी के एक वीडियो में उन्होंने फरमाया कि भारत को नेपाल के प्रति अपने ‘बड़े भाई’ (बिग ब्रदर) वाले रवैये से आगे बढ़ना चाहिए। सचमुच, कितनी क्रांतिकारी और मखमली सोच है! अब तक तो हम मूर्ख भारतीय सोच रहे थे कि नेपाल के नागरिकों को बिना वीजा के भारत में आने देना, यहां काम करने देना और उन्हें गले लगाना ‘भाईचारा’ था, लेकिन थरूर साहब ने चश्मा साफ करके दिखाया कि यह तो दरअसल ‘बिग ब्रदर सिंड्रोम’ है।

चीन का ‘ड्रैगन’ और थरूर का ‘थिसावरस’

थरूर साहब का मानना है कि हमें नेपाल को यह एहसास बिल्कुल नहीं कराना चाहिए कि हम उन पर धौंस जमा रहे हैं। बिल्कुल सही बात है! जब नेपाल में चीनी ड्रैगन अपनी दुम हिलाते हुए नई रेल पटरियां बिछा रहा है और कम्युनिस्टों के इशारे पर भारत को आंखें दिखा रहा है, तब हमें अत्यंत विनम्रता से अपनी डिक्शनरी से कठिन अंग्रेजी शब्द निकालकर नेपाल को समझाने चाहिए। आखिर कूटनीति तो शब्दों का ही खेल है ना? अगर भारत ‘बड़ा भाई’ बनने का फर्ज नहीं निभाएगा, तो ड्रैगन वहां ‘सौतेला पिता’ बनकर पहले ही तैयार बैठा है, जो जमीन हड़पने के बदले में कर्ज की मीठी गोलियां बांटता है। लेकिन थरूर बाबू को इसकी चिंता कहां, उन्हें तो बस भारत की ‘दबंगई’ की फिक्र है।

वैसे, थरूर जी की पार्टी कांग्रेस ने दशकों तक इस देश पर राज किया है। उनके समय की कूटनीति इतनी ‘सॉफ्ट’ और लचीली थी कि पड़ोसी हमारे घर में घुसकर सोफे पर पैर पसार लेते थे और हम शांति का राग अलापते रहते थे। आज जब कूटनीति में थोड़ी रीढ़ की हड्डी और राष्ट्रीय स्वाभिमान दिखाई दे रहा है, तो कांग्रेस के सिपहसालारों को इसमें ‘अहंकार’ नजर आने लगा है। थरूर साहब का सुझाव है कि हमें नेपाल के साथ पूरी तरह ‘समानता’ का व्यवहार करना चाहिए। बेशक! अगली बार जब नेपाल का कोई नेता चीनी शह पर भारतीय क्षेत्रों को अपना दिखाकर नया नक्शा पास करे, तो हमें भी ताली बजानी चाहिए और कहना चाहिए, “वाह छोटे भाई, क्या शानदार चित्रकारी की है!”

निष्कर्ष: कूटनीति या सिर्फ अंग्रेजी का विलाप?

काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि कूटनीति ‘बड़े भाई’ या ‘छोटे भाई’ के भावुक रिश्तों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और सीमाओं की सुरक्षा से चलती है। लेकिन थरूर साहब को कौन समझाए? उन्हें तो बस एक मंच चाहिए जहां वे भारत सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा कर सकें और अपनी वाकपटुता का प्रदर्शन कर सकें। नेपाल के साथ संबंध सुधरेंगे या नहीं, यह तो वक्त और वहां की राजनीति तय करेगी, लेकिन थरूर साहब के इस ज्ञानवर्धक वीडियो से दिल्ली के लुटियंस जोन के बुद्धिजीवियों को शाम की चाय के साथ चबाने के लिए एक नया मुद्दा जरूर मिल गया है। धन्यवाद थरूर बाबू, आपके इस ‘ज्ञान’ के बिना हमारा यह सप्ताह बेहद फीका गुजरता!


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कागा जी