एक अनोखा परिवार और गहरा विश्वास
बहुत समय पहले की बात है, एक शांत और सुंदर गाँव में देविका नाम की एक महिला अपने छोटे से बेटे आरव और एक नेवले के साथ रहती थी। उस नेवले का नाम ‘चम्पक’ था। देविका ने चम्पक को तब बचाया था जब वह जंगलों में अकेला और अनाथ तड़प रहा था। समय के साथ, चम्पक केवल एक पालतू जानवर नहीं, बल्कि देविका के बेटे आरव का सबसे प्यारा रक्षक और भाई जैसा बन गया था। वह अपनी चमकीली आँखों से हमेशा आरव की निगरानी करता और उसके पालने के पास ही सोता था।
एक भयानक दोपहर और काल का साया
एक दोपहर, देविका को कुएं से पानी भरने के लिए बाहर जाना पड़ा। घर में कोई नहीं था। उसने चम्पक की आँखों में देखा और भावुक होकर कहा, “चम्पक, मैं थोड़ी देर में आती हूँ। मेरे बच्चे का ध्यान रखना, वह सो रहा है।” चम्पक ने मानो माँ की भाषा समझ ली और अपनी पूँछ हिलाकर हामी भर दी।
देविका के जाने के कुछ ही समय बाद, कमरे के एक कोने से एक विशाल और अत्यंत जहरीला काला साँप रेंगता हुआ आरव के पालने की तरफ बढ़ने लगा। साँप को देखते ही चम्पक का खून खौल उठा। उसने बिना अपनी जान की परवाह किए उस भयानक काल पर हमला कर दिया। दोनों के बीच एक खूनी संघर्ष हुआ। चम्पक घायल हुआ, पर उसने अपनी बहादुरी से साँप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और अपने छोटे भाई आरव की जान बचा ली।
जल्दबाजी का खूनी न्याय
इस भयंकर लड़ाई के कारण चम्पक का मुँह और पंजे खून से लथपथ हो गए थे। अपनी जीत की ख़ुशी और स्वामिभक्ति के गर्व में, वह देविका का स्वागत करने के लिए घर के मुख्य दरवाज़े पर आकर बैठ गया। जैसे ही देविका पानी का घड़ा लेकर लौटी, उसने चम्पक के मुँह पर ताज़ा खून लगा देखा। उसके दिमाग में एक भयानक और गलत विचार कौंधा—”इस जंगली जानवर ने मेरे मासूम बच्चे को मार डाला!”
बिना एक पल सोचे, क्रोध और ममता के गहरे सदमे में अंधी होकर, देविका ने पानी से भरा भारी मिट्टी का घड़ा पूरी ताकत से चम्पक के नाजुक शरीर पर पटक दिया। एक दर्दनाक चीख के साथ, उस वफादार नेवले ने वहीं दम तोड़ दिया। उसकी आँखों में अपनी मालकिन के लिए कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि केवल एक गहरा दुःख और अचरज था कि उसे अपनी वफादारी का यह इनाम मिला।
अंधेरे कमरे का कड़वा सच
रोती-बिलखती और छाती पीटती हुई देविका जब भागकर कमरे के भीतर गई, तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आरव पालने में सुरक्षित सो रहा था और नींद में मुस्कुरा रहा था, जबकि पालने के ठीक नीचे एक विशाल काले साँप का लहूलुहान शव पड़ा हुआ था।
देविका को तुरंत अपनी भयानक भूल का अहसास हो गया। वह बाहर भागी और चम्पक के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर रोने लगी। उसने चिल्लाकर चम्पक का नाम पुकारा, उसे जगाने की कोशिश की, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। चम्पक का वह निश्छल प्रेम और मौन बलिदान देविका के क्षणिक क्रोध की भेंट चढ़ चुका था। देविका जीवनभर उस ग्लानि और आत्मग्लानि की आग में जलती रही।
कहानी की सीख (Moral)
सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ‘बिना सोचे-समझे और अत्यधिक क्रोध में किया गया कार्य हमेशा विनाशकारी होता है।’ परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न दिखे, सच जाने बिना कभी भी कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, अन्यथा जीवनभर का पछतावा ही हाथ रहता है।