वाह! न्यू यॉर्क की ठंडी एसी प्रयोगशालाओं में बैठकर भारतीय राजनीति का भविष्य बांचने की कला में ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ का कोई मुकाबला नहीं है। हाल ही में इस महान अमरीकी ज्ञानकोश ने एक नया ‘सनसनीखेज’ खुलासा किया है—“मोदी का भारत के विरोध-प्रदर्शनों को रोकने का प्लान”। ऐसा लगता है कि वाशिंगटन के पत्रकार सीधे रायसीना हिल की दीवारों में कान लगाकर सो रहे थे और उन्हें अचानक मोदी जी की गुप्त फाइलों की गंध आ गई।
अमरीकी दूरबीन और भारतीय सड़कें
हम सीधे-सादे भारतीयों को तो यही लगता था कि जब कोई प्रदर्शन होता है, तो पुलिस पानी की बौछार चलाती है, धारा 144 लगाती है या इंटरनेट बंद कर देती है। लेकिन न्यू यॉर्क टाइम्स के अति-सवेदनशील चश्मे से देखें तो यह सब मामूली बातें नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र को ‘डिजिटल तरीके से कुचलने’ का महा-षड्यंत्र है! अब इन अमरीकी विद्वानों को कौन समझाए कि भारत में चाय की टपरी से लेकर संसद के घेराव तक, आंदोलन करना हमारी राष्ट्रीय दिनचर्या का हिस्सा है। यहाँ लोग नाश्ते में जलेबी और दोपहर में धरना एक साथ पचा सकते हैं।
मास्टरप्लान के तीन महा-अस्त्र
न्यू यॉर्क टाइम्स के इस खोजी लेख के पीछे का असली ‘मास्टरप्लान’ क्या हो सकता है? काक-वाणी ने अपने गुप्त कौवों के जरिए इसका पता लगाया है:
पहला हथियार है—‘डिजिटल उपवास’। यानी जैसे ही कोई सड़क पर तंबू गाड़ेगा, इलाके का इंटरनेट गायब! अब आप ही बताइए, बिना इंस्टाग्राम रील और लाइव स्ट्रीमिंग के आज का क्रांतिकारी आंदोलन कैसे चलाएगा? दूसरा हथियार है—‘आंदोलनजीवी’ का तमगा। एक बार किसी को यह उपाधि मिल गई, तो बेचारा प्रदर्शनकारी आधा जीवन यह साबित करने में ही निकाल देगा कि वह सचमुच दुखी नागरिक है, कोई ‘पार्ट-टाइम क्रांतिकारी’ नहीं।
और तीसरा सबसे अचूक हथियार—प्रदर्शनकारियों को न्यू यॉर्क टाइम्स के लंबे-चौड़े लेख पढ़ने के लिए दे देना! यकीन मानिए, तीन पन्ने का भारी-भरकम अमरीकी उपदेश पढ़ते ही बड़े से बड़ा आंदोलनकारी भी खर्राटे लेने लगेगा और शांति से घर लौट जाएगा।
काक-वाणी का कड़वा सच
सच तो यह है कि न्यू यॉर्क टाइम्स को भारत की हर खबर में ‘लोकतंत्र का अंत’ ही नजर आता है। अगर सरकार सड़क का अतिक्रमण हटाए तो तानाशाही, और अगर प्रदर्शनकारी एम्बुलेंस का रास्ता रोकें तो वह ‘अभिव्यक्ति की आजादी’! खैर, मोदी जी का मास्टरप्लान सफल हो या न हो, लेकिन अमरीकी मीडिया का भारत के नाम पर अपनी गिरती टीआरपी बचाने का मास्टरप्लान एकदम सुपरहिट चल रहा है। काक-वाणी की उन्हें एक ही सलाह है—थोड़ा ठंडा पानी पीजिए, भारत का लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं है कि किसी एक लेख से हिल जाए!
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