प्रणाम पाठकों! स्वागत है आपका ‘काक-वाणी’ के इस विशेष बुलेटिन में, जहाँ हम राजनीति की सड़ी-गली सड़कों पर उड़ते हुए कचरे में से सच के मोती चुनते हैं। आज हमारी दूरबीन ने कतर के सरकारी चश्मे ‘अल-जज़ीरा’ को रोते हुए देखा है। रोना इस बात का नहीं है कि दुनिया में भुखमरी बढ़ रही है, बल्कि दुख इस बात का है कि रवींद्रनाथ टैगोर की पावन भूमि, हमारे प्यारे बंगाल से ‘बीफ’ (गोमांस) गायब हो रहा है! जी हाँ, अल-जज़ीरा की मानें तो बंगाल के लोग अब अपने आहार को बदलने के लिए ‘मजबूर’ हो रहे हैं, और इस घोर कलयुग का एकमात्र खलनायक है—BJP!
दीदी का राज, बीजेपी का भूत और अल-जज़ीरा का ‘मेन्यू कार्ड’
यह रिपोर्ट पढ़कर हमारी कौवा बुद्धि चकरा गई। बंगाल में सरकार ममता दीदी की है, पुलिस उनकी है, प्रशासन उनका है और हवाओं में आज भी ‘खेला होबे’ का नारा गूँज रहा है। लेकिन मजाल है कि अल-जज़ीरा दीदी के इस मजबूत सेक्युलर साम्राज्य पर उंगली उठा दे! सारा दोष थोपा गया है बीजेपी के ‘खौफ’ पर। वाह रे अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता! इसे कहते हैं ‘घर में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने’।
बंगाल के वे कथित ‘बुद्धिजीवी’ जो कल तक बीफ फेस्टिवल मनाकर अपनी धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट छाती पर टांगे घूमते थे, आज अल-जज़ीरा के अनुसार डर के मारे पत्ता-गोभी चबाने को मजबूर हैं। रिपोर्ट कहती है कि यह ‘आहार परिवर्तन’ किसी स्वास्थ्य कारणों या जिम जाने की वजह से नहीं, बल्कि बीजेपी के ‘अदृश्य प्रभाव’ के कारण हो रहा है। धन्य है वह पार्टी जो बंगाल की सत्ता में न होकर भी लोगों की थाली और पेट के मेन्यू कार्ड को रिमोट कंट्रोल से नियंत्रित कर रही है!
क्या अब रोशोगुल्ला भी ‘भगवा’ हो जाएगा?
अब डर इस बात का है कि कल को यही अल-जज़ीरा रिपोर्ट छापेगा कि बीजेपी के डर से हावड़ा ब्रिज का रंग केसरिया हो रहा है और संदेश तथा रोशोगुल्ला में रस की जगह गाय का घी मिलाया जा रहा है। कोलकाता के ‘कैफे कल्चर’ में जो क्रांतिकारी बुद्धिजीवी सिगरेट के धुएं के बीच क्रांति के सपने बुनते थे, उनके लिए यह सचमुच किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं है। अब बेचारे ‘फिश फ्राई’ खाकर ही अपनी क्रांति को जिंदा रखे हुए हैं।
‘काक-वाणी’ का सुझाव है कि अल-जज़ीरा को इस ‘भयानक अत्याचार’ के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में एक विशेष प्रस्ताव लाना चाहिए। आखिर इंसानी अधिकारों में ‘मनपसंद मांस खाने का अधिकार’ सबसे ऊपर होना चाहिए, भले ही इसके लिए आपको बंगाल के असल मुद्दों और वहां की कानून-व्यवस्था को पूरी तरह से नजरअंदाज क्यों न करना पड़े। चलते-चलते, हम तो यही कहेंगे कि राजनीति में विरोधियों के ‘पेट’ पर लात मारना तो पुराना फैशन था, लेकिन बिना सरकार के ही थाली से ‘बीफ’ गायब कर देना… बीजेपी की इस जादुई कला को तो दाद देनी ही पड़ेगी! दीदी देखती रह गईं और खेल हो गया!
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