बांग्लादेशी ‘टेंप्लेट’ और हमारे विपक्ष के मुंगेरीलाली सपने

अहा! टीवी स्टूडियो के वातानुकूलित कमरों में ‘क्रांति’ का नया शंखनाद हुआ है। बांग्लादेश में क्या एक सरकार गिरी, हमारे यहाँ के कुछ विचारकों, प्रवक्ताओं और राजनीति के पार्ट-टाइम क्रांतिकारियों के चेहरे पर वैसी ही चमक आ गई, जैसी किसी भूखे को मुफ्त की बिरयानी देखकर आती है। एंकरों को ‘विदेशी षड्यंत्र’ की टीआरपी वाला नया खिलौना मिल गया है, और कुछ विपक्षी मनचलों को लग रहा है कि ढाका से लोकतंत्र का नया ‘टेंप्लेट’ आ गया है, जिसे दिल्ली के जंतर-मंतर पर बस ‘डाउनलोड’ करना बाकी है।

क्रांति का ‘इम्पोर्टेड’ मॉडल और आलसी राजनीतिज्ञ

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहाँ हर कोई शॉर्टकट ढूंढ रहा है। चुनाव जीतकर सत्ता में आना कितना थकाऊ काम है—कड़क धूप में रैलियाँ करो, भाषण दो, पसीना बहाओ और अंत में जनता फिर भी ईवीएम पर कोई ‘गलत’ बटन दबा दे! इससे तो कहीं बेहतर है कि ढाका जैसा कोई ‘टेंप्लेट’ भारत में भी शुरू हो जाए? कुछ लोग तो रात को सोते समय सपने में खुद को प्रधानमंत्री आवास की बालकनी से हाथ हिलाते हुए भी देख चुके होंगे। लेकिन अफसोस, भारतीय लोकतंत्र कोई चाईनीज खिलौना नहीं है कि दो-चार मोमबत्तियाँ जलाने और ट्विटर पर हैशटैग चलाने से पूरी इमारत ढह जाए।

प्राइम टाइम का तख्तापलट और चाय की टपरी

दूसरी तरफ, हमारे टीवी एंकरों की हालत तो देखिए। ‘दिसेंट या डिस्टैबिलाइजेशन?’ जैसे भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दों का जाल बुनकर प्राइम टाइम में ऐसे चिल्ला रहे हैं मानो प्रदर्शनकारी सीधे उनके स्टूडियो का एसी बंद करने आ रहे हों। अब हर शांतिपूर्ण आंदोलन इन्हें ‘डीप स्टेट’ की साजिश लग रहा है। कल को अगर किसी नुक्कड़ की टपरी पर चाय में चीनी कम हुई और चार लोग बहस करने लगे, तो नेशनल मीडिया उसे ‘टूलकिट’ और ‘बांग्लादेशी पैटर्न’ घोषित कर देगा।

सच तो यह है कि भारत में सड़कों पर तख्तापलट करना नामुमकिन है। यहाँ अगर चार लोग क्रांति के लिए इकट्ठा भी हो जाएँ, तो आधे रास्ते में ही ‘समोसे और जलेबी’ की दुकान देखकर धरना स्थगित हो जाता है। रही बात हमारी जनता की, तो वह हर पाँच साल में (और राज्यों में हर दो साल में) अपना तख्तापलट पोलिंग बूथ पर जाकर शांति से कर देती है।

इसलिए, ‘काक-वाणी’ की मुफ़्त सलाह यही है: ढाका का मौसम देखकर दिल्ली में छाता खोलना बंद कीजिए। विरोध करना आपका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन ‘बांग्लादेशी टेंप्लेट’ से सरकार गिराने के सपने देखना सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक मतिभ्रम है। चाय पीजिए, मस्त रहिए और अगले चुनाव का इंतज़ार कीजिए!


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कागा जी