बोल्ड, बिंदास और बागी: जब घरेलू हिंसा से भागकर दुर्गाबाई कामत बनीं भारत की पहली फीमेल एक्टर!

आज जब हम बॉलीवुड हसीनाओं को करोड़ों के विला, चमचमाती गाड़ियों और रैंप वॉक पर जलवे बिखेरते देखते हैं, तो लगता है कि ‘एक्ट्रेस’ होना कितनी मखमली डगर है। लेकिन बॉस, इस डगर पर पहला कदम रखने वाली महिला अपने पैरों में छाले और दिल में जख्म लेकर चली थी! जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत की पहली महिला एक्टर **दुर्गाबाई कामत (Durgabai Kamat)** की।

हाल ही में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट ने इतिहास के उस पन्ने को फिर से खोला है, जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाएंगे। दुर्गाबाई ने कैमरे का सामना किसी शौकिया ग्लैमर या फेम के लिए नहीं, बल्कि खुद को और अपनी नन्ही बेटी को जिंदा रखने के लिए किया था।

जब मर्दों के राज में एक औरत ने की बगावत

भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के ने जब 1913 में ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, तो उसमें तारामती (महिला) का रोल भी एक पुरुष (अण्णा साळुंके) ने साड़ी पहनकर किया था। वजह? उस दौर में भले घर की औरतें फिल्मों में काम करने की सोच भी नहीं सकती थीं। इसे बेहद ‘बदनाम’ काम माना जाता था। लेकिन समाज के इस सड़े-गले नियम को तोड़ने के लिए नियति ने दुर्गाबाई कामत को चुना।

दुर्गाबाई की शादी एक आनंदराव नार्गोकर नाम के शख्स से हुई थी, लेकिन यह शादी किसी नरक से कम नहीं थी। रोज-रोज की घरेलू हिंसा और प्रताड़ना से तंग आकर दुर्गाबाई ने समाज के कायदे-कानूनों को ठेंगा दिखाया और अपनी छोटी सी बेटी कमलाबाई को गोद में लेकर उस हिंसक शादी से भाग निकलीं।

पेट पालने की जद्दोजहद और सिनेमा का सहारा

एक अकेली औरत के लिए 20वीं सदी की शुरुआत में रहना और पेट पालना मौत का कुआं पार करने जैसा था। उनके पास न घर था, न पैसे। तब दादा साहब फाल्के उनके लिए मसीहा बनकर आए। उन्होंने अपनी दूसरी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913) में दुर्गाबाई को ‘पार्वती’ और उनकी बेटी कमलाबाई को ‘मोहिनी’ का रोल ऑफर किया।

दुर्गाबाई के पास खोने को कुछ नहीं था। उन्होंने समाज के तानों और रूढ़ियों को लात मारी और सिर्फ जीवित रहने के संघर्ष में कैमरे के सामने खड़ी हो गईं। इस तरह वह भारतीय सिनेमा की पहली फीमेल एक्टर बनीं।

‘काक-वाणी’ का नजरिया: असली फेमिनिज्म तो तब था!

आजकल सोशल मीडिया पर ‘फेमिनिज्म’ और ‘महिला सशक्तिकरण’ पर ज्ञान देना बहुत आसान है, लेकिन असली फेमिनिज्म तो दुर्गाबाई कामत ने जिया था। उन्होंने साबित किया कि औरत बेचारी नहीं होती, बल्कि वक्त आने पर अपनी और अपने बच्चे की तकदीर खुद लिखने वाली महाकाली बन सकती है।

दुर्गाबाई कामत की यह दास्तान हमें याद दिलाती है कि आज जो बॉलीवुड की चकाचौंध हम देख रहे हैं, उसकी बुनियाद एक बेखौफ औरत के संघर्ष, आंसुओं और हिम्मत से रखी गई थी। ‘काक-वाणी’ का इस पहली रीयल-लाइफ और रील-लाइफ हीरो को सौ-सौ सलाम!


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कागा जी