काक-वाणी के सभी सुधी पाठकों को क्रांतिकारी जोहार! कश्मीर की खूबसूरत वादियों में मौसम बदले न बदले, लेकिन राजनेताओं का ‘राजनीतिक मौसम’ इतनी तेजी से बदलता है कि मौसम विभाग भी डिप्रेशन में आ जाए। हाल ही में विलय दिवस के पावन अवसर पर हमारी आदरणीया महबूबा मुफ़्ती साहिबा को अचानक एक दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई है। उन्होंने फरमाया कि शेख अब्दुल्ला की प्रो-पाकिस्तान राजनीति ने बेकसूर कश्मीरियों को देश की नजरों में ‘संदिग्ध’ बना दिया।
इतिहास का चश्मा और सहूलियत का राजनीतिशास्त्र
वाह! क्या दूरदर्शिता है! यह सुनकर तो इतिहास भी अपनी किताबों के पन्ने फाड़कर दोबारा लिखने की भीख मांगने लगा होगा। महबूबा जी का यह बयान सुनकर ऐसा लगा मानो कश्मीरी राजनीति के सारे पापों का केवल एक ही धोबी था- शेख अब्दुल्ला। बाकी सब तो वादियों में सिर्फ केसर की खेती और बर्फ का आनंद ले रहे थे!
वही महबूबा जी, जो कभी चेतावनी देती थीं कि अगर धारा 370 हटी तो कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई कंधा नहीं मिलेगा, आज विलय दिवस पर इतिहास की सबसे बड़ी देशभक्त और न्यायाधीश बनकर बैठी हैं। इसे कहते हैं राजनीति की ‘रिवर्स स्विंग’! जब जनता पुराने बयानों का हिसाब मांगने लगे, तो इतिहास के पन्नों को उघाड़ो और सारा दोष किसी पूर्ववर्ती नेता के सर मढ़ दो।
पुरानी मलाई और नया चम्मच
कश्मीर की सियासत का यह बड़ा पुराना और पसंदीदा नियम रहा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस वाले पीडीपी को कोसेंगे, और पीडीपी वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस को। जब सत्ता की मलाई खानी हो तो दिल्ली के साथ गठबंधन का अमराठ चखेंगे, और जब कुर्सी खिसक जाए या चुनाव नजदीक आएं, तो शेख अब्दुल्ला या पाकिस्तान के नाम का रोना रोएंगे। महबूबा जी को अब जाकर याद आ रहा है कि शेख साहब की नीतियों ने कश्मीरियों का कितना सामाजिक नुकसान किया।
लेकिन मैडम, जब आपकी पार्टी दिल्ली के साथ मिलकर सत्ता के सुख भोग रही थी, तब क्या इतिहास के ये पन्ने दीमक खा गए थे? या उस वक्त शेख अब्दुल्ला के ऐतिहासिक गुनाह आपके लिए अप्रासंगिक थे?
काक-वाणी का ज्ञान
खैर, ‘काक-वाणी’ इस महान राजनीतिक कलाबाजी को साष्टांग प्रणाम करती है। कश्मीर की बेचारी आवाम को अब समझ जाना चाहिए कि नेता कोई भी हो—अब्दुल्ला हों या मुफ़्ती—जब भी अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखे, तो अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी मरे हुए नेता को मुजरिम बना दो। अब देखना यह है कि इस बयान के बाद उमर अब्दुल्ला साहब अपनी डिक्शनरी से महबूबा जी के लिए कौन सा तीखा विशेषण निकालते हैं। तब तक के लिए, कांव-कांव जारी रहेगा!
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