सुंदरवन का अभिमानी गजराज
सुंदरवन के घने जंगलों में शत्रुदंत नाम का एक विशालकाय हाथी रहता था। वह अपनी असीम ताकत के नशे में चूर रहता था। उसे अपनी विशाल काया पर इतना घमंड था कि वह रास्ते में आने वाले बड़े से बड़े पेड़ों को उखाड़ फेंकता और छोटे जानवरों के घरों को तहस-नहस कर देता था। पूरे जंगल के जीव उससे थर-थर कांपते थे। शत्रुदंत को लगता था कि दूसरों के मन में डर पैदा करना ही उसकी असली ताकत है। कोई भी उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करता था, और यही बात उसके अहंकार को और बढ़ा देती थी।
एक दर्दभरी पुकार और पिघलता हुआ हृदय
एक दोपहर, भीषण गर्मी के दौरान, शत्रुदंत मदमस्त होकर जंगल में घूम रहा था। उसने गुस्से में आकर एक बड़े बरगद के पेड़ को हिलाना शुरू कर दिया। तभी उसे नीचे से एक अत्यंत कोमल और दर्दभरी चीख सुनाई दी। उसने नीचे देखा, तो एक नन्ही चिड़िया तड़प रही थी। पेड़ के हिलने से उसका घोंसला नीचे गिर गया था, उसके अंडे जमीन पर बिखर गए थे और उसका एक पंख बुरी तरह जख्मी हो गया था।
चिड़िया ने डर कर भागने के बजाय अपनी नम आंखों से शत्रुदंत की ओर देखा और अत्यंत करुण स्वर में कहा, “हे महाबली! आपके पास असीम शक्ति है। आप चाहें तो मुझे और मेरे इन बचे हुए अंडों को एक पल में कुचल सकते हैं। लेकिन क्या आपकी यह महान शक्ति केवल विनाश करने के लिए है? मेरी संतानें धूप में दम तोड़ रही हैं, क्या आप अपनी परछाई से हमारी रक्षा करेंगे?”
नन्ही चिड़िया के इन मर्मस्पर्शी शब्दों ने शत्रुदंत के भीतर कुछ झकझोर दिया। आज तक किसी ने उससे मदद नहीं मांगी थी, सब सिर्फ डर कर भागते थे। पहली बार उसे अपनी ताकत पर गर्व की जगह ग्लानि महसूस हुई। उसका कठोर हृदय अंदर से पिघल गया।
क्रूरता से करुणा का सफर
शत्रुदंत ने बिना देर किए अपना भारी शरीर उस दिशा में मोड़ लिया जहां चिड़िया और उसके अंडे पड़े थे। वह तपती धूप में घंटों बिना हिले-डुले खड़ा रहा, ताकि उसकी परछाई से उस नन्हे परिवार को शीतलता मिल सके। उसने अपनी सूंड से तालाब से पानी लाकर चिड़िया के जख्मों पर छिड़का और उसे पीने के लिए पानी दिया।
कई दिनों तक शत्रुदंत उसी जगह पर डटा रहा। वह उस चिड़िया और उसके आने वाले बच्चों का रक्षक बन गया था। कुछ दिनों बाद अंडों से नन्हे बच्चे बाहर आ गए और उनकी चहचहाहट से पूरा माहौल गूंज उठा। शत्रुदंत के चेहरे पर एक ऐसी खुशी थी जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची शक्ति और महानता दूसरों पर अधिकार जताने या उन्हें डराने में नहीं, बल्कि कमजोरों की रक्षा करने और उनके प्रति दयाभाव रखने में है। शारीरिक बल तब तक व्यर्थ है जब तक आपके भीतर दूसरों के दर्द को समझने वाला संवेदनशील दिल न हो।