हमारे देश के परम आदरणीय, ज्ञान के जीते-जागते एनसाइक्लोपीडिया और इतिहास के स्वघोषित ठेकेदार रामचंद्र गुहा जी ने एक बार फिर अपने ज्ञान की गंगा बहाई है। स्क्रॉल.इन (Scroll.in) पर अपने ताजा महाप्रवचन में उन्होंने फरमाया है कि पिछले 120 वर्षों से भारतीय छात्र, राजनीति और सार्वजनिक जीवन को बदलने के लिए लड़ रहे हैं। सचमुच, इस ऐतिहासिक खुलासे के बाद देश के तमाम विश्वविद्यालयों की कैंटीनों में समोसे और चाय की उधारी का ग्राफ अचानक से सम्मानजनक महसूस करने लगा होगा।
40 की उम्र में भी ‘छात्र’ रहने की अद्भुत कला
गुहा जी की इस ऐतिहासिक रिसर्च पर ‘काक-वाणी’ को कोई संदेह नहीं है। आखिर 120 साल का इतिहास गवाह है कि हमारे देश में छात्र राजनीति ने देश को ऐसे-ऐसे अनमोल रत्न दिए हैं, जो 40 साल की उम्र में भी ‘छात्र नेता’ कहलाने का गौरव प्राप्त करते हैं। जब देश का आम नौजवान नौकरी ढूंढने और बाल-बच्चों की स्कूल फीस भरने की चिंता में बूढ़ा हो रहा होता है, तब हमारे ये क्रांतिकारी छात्र ‘एम.ए. इन चायपत्ती अनुसंधान’ या ‘पीएचडी इन विरोध प्रदर्शन’ की सातवीं डिग्री ले रहे होते हैं। गुहा जी शायद इसी ‘बदलाव’ की बात कर रहे हैं, जहां छात्र पढ़ाई छोड़कर बाकी सब कुछ बदलने की कसम खाए बैठे हैं।
क्रांति की बयार: राजनीति तो वैसी ही रही, बस नारे बदल गए
120 साल से देश बदलने की इस जंग का नतीजा यह हुआ है कि देश की राजनीति तो टस से मस नहीं हुई, अलबत्ता छात्र संगठनों के झंडों के रंग जरूर थोड़े चटक हो गए हैं। पहले के छात्र देश की आजादी और राष्ट्र निर्माण के लिए लड़ते थे, और आज के होनहार छात्र हॉस्टल के वाई-फाई की स्पीड और मेस में मिलने वाले पनीर के टुकड़ों के साइज पर ‘क्रांति’ का बिगुल फूंक देते हैं। गुहा जी जैसे इतिहासकारों को इस नन्हीं सी नोकझोंक में भी ‘फ्रेंच रिवॉल्यूशन’ की खुशबू आ जाती है। आखिरकार, जब तक छात्र राजनीति जिंदा रहेगी, तब तक इन बुद्धिजीवियों के कॉलम भी तो छपते रहेंगे।
खैर, रामचंद्र गुहा जी के इस ऐतिहासिक ज्ञान के लिए हमें उनका आभारी होना चाहिए। अब यह अलग बात है कि इन 120 सालों में छात्र राजनीति ने देश को कितने काबिल नीति-निर्माता दिए और कितने ऐसे ‘शाश्वत छात्र’ दिए जो आज भी विश्वविद्यालयों को अपना ससुराल मानकर वहीं डटे हुए हैं। खैर, क्रांति चलती रहनी चाहिए, चाहे वह परीक्षा पास करने की हो या बिना पढ़े ही डिग्री पाने की मांग करने की!
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