आदरणीय देशवासियों, अपनी आँखें खोलिए और कृतज्ञता से भर जाइए! ऑल इंडिया रेडियो (News On AIR) के सौजन्य से हमें एक अत्यंत क्रांतिकारी सत्य का पता चला है। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की है कि भाजपा ने भारतीय राजनीति में ‘राष्ट्र-प्रथम’ (Nation-First) का एक नया और अनूठा सिद्धांत स्थापित किया है। सचमुच, इस ऐतिहासिक खुलासे के बाद हम ‘काक-वाणी’ के दफ्तर में बैठे कौवे शर्म से पानी-पानी हो रहे हैं कि हम पिछले सात दशकों से इस देश को बिना किसी ‘सिद्धांत’ के ही हवा में उड़ते हुए देख रहे थे!
2014 से पहले का अंधकार युग: जब देश सिर्फ एक नक्शा था
प्रधानमंत्री जी के इस ज्ञानोदय से पहले, हम अज्ञानी यही समझते थे कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, और सुभाष चंद्र बोस जैसे लोगों ने भी शायद ‘देश’ के लिए ही कुछ किया था। लेकिन भाजपा के इस नए सिद्धांत के आने के बाद साफ हो गया है कि वे सब तो बस शौकिया तौर पर देश-प्रेम का अभिनय कर रहे थे। असली पेटेंटेड ‘राष्ट्र-प्रथम’ तो अब जाकर रजिस्टर हुआ है। उससे पहले तो भारतीय राजनीति में ‘स्वयं-प्रथम’, ‘परिवार-प्रथम’ और ‘भ्रष्टाचार-प्रथम’ का ही त्रिकोणीय मुकाबला चल रहा था। देश तो जैसे अस्तित्व में ही नहीं था, बस एक जमीन का टुकड़ा था जिसे 2014 में अचानक प्राणवायु मिली।
पार्टी का नया व्याकरण: राष्ट्र मतलब चुनाव, और चुनाव मतलब राष्ट्र!
इस ‘राष्ट्र-प्रथम’ के दिव्य सिद्धांत को गहराई से समझने के लिए आपको अपना चश्मा बदलना होगा। इस नए राजनीति शास्त्र के अनुसार, जब देश में पेट्रोल सौ के पार जाता है, तो वह ‘राष्ट्र-हित’ में होता है। जब सरकारी संपत्तियां कुछ चुनिंदा मित्रों को सौंपी जाती हैं, तो वह ‘राष्ट्र-कल्याण’ के तहत आता है। यहाँ तक कि चौबीसों घंटे, बारहों महीने चुनावी मोड में रहना और हर राज्य में विपक्ष की सरकार गिराना भी ‘राष्ट्र-निर्माण’ का ही एक गुप्त हिस्सा है।
इस सिद्धांत की खूबसूरती देखिए—अब विपक्ष के पास बोलने को कुछ बचा ही नहीं है। अगर आप सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं, तो आप ‘राष्ट्र’ के खिलाफ खड़े हैं। अगर आप रोजगार मांगते हैं, तो आप ‘राष्ट्र’ के विकास में बाधा डाल रहे हैं। कुल मिलाकर, ‘राष्ट्र’ अब एक ऐसी मजबूत ढाल बन चुका है जिसके पीछे छिपकर किसी भी नाकामी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट थमाया जा सकता है।
काग-भुशुंडि की अंतिम टिप्पणी
हम ‘काक-वाणी’ वाले तो ठहरे नासमझ पक्षी। हमें तो आज तक यही लगा था कि राष्ट्र का मतलब देश के जीवित नागरिक, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार होता है। लेकिन राजनीति के इस स्वर्ण काल में समझ आया कि राष्ट्र का मतलब केवल शानदार हेडलाइंस, चमचमाती पीआर रील्स और विरोधियों को देशद्रोही साबित करना है। धन्य है यह ‘राष्ट्र-प्रथम’ का सिद्धांत, जिसने हमें सिखाया कि जनता भूखी भले रहे, लेकिन उसका सीना हमेशा गर्व से फुला रहना चाहिए!
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