लुटियंस का ‘कैमलोट’ और राजा आर्थर का नया अवतार

वाह! क्या दिव्य दृष्टि है। जब देश की साधारण जनता भीषण गर्मी, महंगाई और रोज़गार की तलाश में पसीना बहा रही है, तब हमारे परम आदरणीय बुद्धिजीवी ‘द वायर’ के दफ्तर में बैठकर भारत के लिए ‘कैमलोट मोमेंट’ (Camelot Moment) का आविष्कार कर रहे हैं। पश्चिमी इतिहास के पन्नों से धूल झाड़कर, किंग आर्थर और उनके चमत्कारी शासनकाल को लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में स्थापित कर दिया गया है। ऐसा लगता है कि भारतीय राजनीति अब अमेठी और वायनाड से नहीं, बल्कि पांचवीं सदी के ब्रिटेन के काल्पनिक महलों से संचालित हो रही है।

लुटियंस के ड्राइंग रूम में ‘किंग आर्थर’ का अवतरण

इस महान बौद्धिक थ्योरी के अनुसार, हमारे परम पूज्य ‘युवा’ नेता अब किंग आर्थर बन चुके हैं। इतिहास गवाह है कि किंग आर्थर ने पत्थर से जादुई तलवार ‘एक्सकैलिबर’ निकाल कर अपनी योग्यता सिद्ध की थी। हमारे आधुनिक आर्थर भी पिछले दो दशकों से बार-बार राजनीति के कड़े पत्थरों से खुद को बाहर निकालने का प्रयास कर रहे हैं। हर चुनाव के बाद, जब भी वे दो-चार सीटें अधिक पा लेते हैं, तो हमारे क्रांतिकारी पत्रकारों को उनकी आँखों में ‘कैमलोट’ की चमक दिखाई देने लगती है। इस अपार श्रद्धा के आगे तो पारम्परिक भक्ति भी पानी भरती नज़र आती है।

गोलमेज सम्मेलन और मोहब्बत की जादुई दुकान

इस नए ‘कैमलोट’ में राजा के शूरवीर योद्धा (Knights) कौन हैं? वही पुराने दरबारी, जो हर चुनाव हारने के बाद भी ‘नैतिक जीत’ का डंका बजाते हैं। यहाँ गोलमेज की जगह ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ की मेज है, जहाँ कठिन और तीखे सवालों के जवाब में ‘मोहब्बत की दुकान’ का मीठा शर्बत पिलाया जाता है। इस रोमानियत की दाद देनी होगी कि जहाँ आम मतदाता बिजली, सड़क, पानी और राशन पर वोट कर रहा है, वहीं हमारे बुद्धिजीवी इसे मध्यकालीन यूरोपीय महाकाव्य घोषित करने में व्यस्त हैं।

शायद जल्द ही ‘द वायर’ पर एक नया शोध प्रकाशित होगा कि कैसे राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा वास्तव में पवित्र ‘होली ग्रेल’ (Holy Grail) की खोज थी! देश की गरीब जनता भले ही इस अंग्रेजी ‘कैमलोट’ का अर्थ न समझ पाए, लेकिन लुटियंस के बौद्धिक विमर्श में खुद को सांत्वना देने के लिए यह एक अद्भुत खिलौना है। आखिर, मिर्जा गालिब का वह शेर ऐसे ही समय के लिए तो था—’दिल के खुश रखने को ‘वायर’ ये ख्याल अच्छा है!’


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कागा जी