शताब्दी पुरुष आडवाणी: ‘मार्गदर्शक मंडल’ से राजनीति का दूरदर्शन

100 की दहलीज़ पर ‘पितामह’: नींव का पत्थर, जिस पर महल बन गया

भारतीय राजनीति की पिच पर लालकृष्ण आडवाणी अपने जीवन के 100वें वर्ष की ओर बढ़ रहे हैं। मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक उनकी ‘पुनर्निर्माण’ गाथा के कसीदे पढ़े जा रहे हैं। ‘काक-वाणी’ भी इस ऐतिहासिक क्षण पर अपने तीखे सुरों में बधाई देना अपना परम कर्तव्य मानती है। आखिरकार, जिस व्यक्ति ने दो सीटों वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए अपनी यात्रा से रथ का पहिया घुमाया था, आज वही व्यक्ति मार्गदर्शक मंडल नाम के भव्य और शांत विश्राम गृह की खिड़की से बैठकर राजनीति का 4K डिजिटल अवतार देख रहा है। इसे ही कहते हैं असली ‘दृष्टिकोण’!

रथयात्रा से मौनव्रत तक: त्याग की अनकही कहानी

अस्सी और नब्बे के दशक में जब आडवाणी जी ने सोमनाथ से अयोध्या तक का ऐतिहासिक रथ निकाला था, तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा था कि उस रथ का अंतिम पड़ाव लुटियंस दिल्ली का एक शांत बंगला होगा। उन्होंने पार्टी की नींव में अपनी जवानी की ईंटें चुनीं, ताकि आज के ‘नव-अवतार’ उस पर अपनी नक्काशीदार भव्य इमारत खड़ी कर सकें। यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चमत्कार है कि नींव रखने वाला आज मार्गदर्शक मंडल में इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि कब कोई नया शिष्य उनसे ‘मार्गदर्शन’ मांगने आए। हालाँकि, आधुनिक राजनीति में मार्गदर्शन माँगना अब आउटडेटेड फैशन हो चुका है, अब तो केवल ‘आदेश’ चलते हैं!

‘भारत रत्न’ और अप्रासंगिकता का ससम्मान तमगा

हाल ही में जब उन्हें भारत रत्न से नवाज़ा गया, तो देश के कई दिग्गज नेताओं ने राहत की सांस ली। यह पुरस्कार इस बात की मुहर था कि ‘पितामह’ को अब पूरी तरह से ससम्मान इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया गया है। आडवाणी जी ने भारतीय नेताओं को यह कला सिखाई कि कैसे अपनी ही बनाई हुई पार्टी में ‘अति-आदरणीय’ बनकर धीरे से अप्रासंगिक हुआ जाता है। इतिहासकार लिख रहे हैं कि उन्होंने भारत को कैसे पुनर्निर्मित किया, लेकिन ‘काक-वाणी’ तो यही कहेगी कि उन्होंने पार्टी बनाई और पार्टी ने उन्हें एक सुंदर ‘शोपीस’ बना दिया।

खैर, आडवाणी जी को शतक की अग्रिम बधाई। ईश्वर उन्हें लंबी उम्र दे, ताकि वे आराम से बैठकर यह देख सकें कि जो पौधे उन्होंने अपने पसीने से रोपे थे, उनके फल आज कौन, कैसे और किस ब्रांडिंग के साथ खा रहा है। राजनीति भी क्या चीज़ है—जिसने रथ चलाया, अंत में उसी को दर्शक दीर्घा की सबसे पिछली कुर्सी थमा दी!


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कागा जी