सुंदरवन का प्रतापी और अहंकारी राजा
विशाल और घने सुंदरवन में केसरी नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली शेर रहता था। उसकी एक ही दहाड़ से पूरा जंगल कांप उठता था। केसरी को अपनी अपार शक्ति पर बहुत अहंकार था। वह मानता था कि जंगल में केवल शक्तिशाली जीवों को ही जीने का अधिकार है और छोटे या कमजोर जीव केवल उसका भोजन बनने के लिए पैदा हुए हैं।
एक दिन शिकार करते समय केसरी ने चीकू नाम के एक नन्हे खरगोश को अपने पंजों में दबा लिया। चीकू डर से थर-थर कांप रहा था, लेकिन उसने हिम्मत जुटाकर कहा, “हे जंगल के राजा! मुझे मारकर आपका पेट केवल एक पल के लिए भरेगा। यदि आप मुझे जीवनदान देंगे, तो मैं जीवन भर आपका आभारी रहूंगा। शायद कभी यह छोटा सा जीव भी आपके काम आ सके।” केसरी उसकी बात सुनकर जोर से हंसा और बोला, “तुम जैसे तिनके के समान कमजोर जीव की भला मुझे क्या आवश्यकता होगी?” हालांकि, केवल मनोरंजन के भाव में उसने चीकू को छोड़ दिया।
समय का चक्र और विपत्ति का प्रहार
समय बीतता गया और जंगल में मौसम बदला। एक दिन केसरी का मुकाबला जंगली हाथियों के एक झुंड से हो गया। केसरी ने वीरता से लड़ाई लड़ी, लेकिन वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसका एक पैर टूट गया और शरीर पर गहरे घाव हो गए। वह शिकार करना तो दूर, गुफा से बाहर निकलने में भी असमर्थ हो गया।
जो सियार और लोमड़ियां रोज केसरी की चापलूसी करते थे, वे उसे लाचार देखकर एक-एक करके छोड़कर भाग गए। भूखा-प्यासा शेर अपनी गुफा में पड़ा तड़प रहा था और अपनी अंतिम सांसों का इंतजार कर रहा था। उसकी आंखों में पहली बार लाचारी और अकेलापन तैर रहा था।
दया का अमर और निष्पाप स्पर्श
तभी वहां से नन्हा चीकू खरगोश गुजरा। उसने राजा केसरी को उस दर्दनाक हालत में देखा। चीकू वहां से भागा नहीं, बल्कि उसके मन में करुणा उमड़ पड़ी। चीकू रोज केसरी के लिए जंगल से मीठे फल ढूंढकर लाता और पेड़ों की छाल में नदी का शीतल जल भरकर उसे पिलाता। इतना ही नहीं, चीकू जड़ी-बूटियों को पीसकर शेर के घावों पर लगाता।
केसरी की आंखों में हैरानी और शर्मिंदगी के आंसू आ गए। उसने कांपती हुई आवाज में पूछा, “चीकू, मैंने तो तुम्हारा अपमान किया था और तुम्हें निस्सहाय समझा था, फिर तुम अपनी जान जोखिम में डालकर मेरी सेवा क्यों कर रहे हो?” चीकू ने नम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, बलशाली वह नहीं जो दूसरों को डराए, बल्कि सच्चा बलवान तो वह है जो किसी के दुख में उसका सहारा बने।”
एक नया सवेरा और पश्चाताप
चीकू की निस्वार्थ सेवा से केसरी का शरीर ही नहीं, बल्कि उसका कठोर हृदय भी पूरी तरह बदल गया। शेर की आंखों से पश्चाताप की धारा बह निकली। उसने चीकू को गले से लगा लिया। कुछ हफ्तों में केसरी ठीक हो गया, लेकिन वह अब एक अत्याचारी राजा नहीं, बल्कि जंगल के सभी छोटे-बड़े प्राणियों का सच्चा रक्षक बन चुका था।
नैतिक शिक्षा
नैतिक शिक्षा: अहंकार और शारीरिक शक्ति से कई गुना बड़ा दया और करुणा का बल होता है। कभी भी किसी प्राणी को छोटा या कमजोर न समझें, क्योंकि मुसीबत के वक्त प्रेम और दया ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।