निराशा के साए में कबीर
शाम ढल चुकी थी। कबीर अपने कमरे के कोने में घुटनों के बल बैठा हुआ था। उसकी आँखों से बहते आँसू उसके चेहरे पर साफ देखे जा सकते थे। वह अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में असफल हो चुका था। सालों की मेहनत, रात-रात भर जागकर की गई पढ़ाई, सब कुछ एक झटके में बेकार हो गई थी। कबीर को लगने लगा था कि उसकी जिंदगी अब यहीं रुक गई है। उसके मन में केवल हताशा और अंधकार का वास था। उसे अपना भविष्य पूरी तरह धुंधला दिखाई दे रहा था।
दादाजी की पुरानी घड़ियों की दुकान
उसी शहर के दूसरे कोने पर कबीर के दादाजी, रामप्रसाद जी की एक छोटी सी घड़ी मरम्मत की दुकान थी। जब उन्होंने कबीर की असफलता और उसकी टूटती हिम्मत के बारे में सुना, तो उन्होंने उसे अपने पास दुकान पर बुलाया। कबीर भारी कदमों से दादाजी की दुकान पर पहुँचा। दुकान में चारों तरफ घड़ियों की ‘टिक-टिक’ की आवाज गूंज रही थी। वहाँ हर आकार, हर रंग और हर जमाने की घड़ियाँ थीं, कुछ चल रही थीं तो कुछ शांत थीं।
दादाजी ने कबीर के उदास चेहरे को देखा, लेकिन उन्होंने उसे कोई उपदेश नहीं दिया। इसके बजाय, उन्होंने काउंटर पर रखी एक बहुत पुरानी, धूल से सनी जेब घड़ी (pocket watch) उठाई। वह घड़ी सालों से बंद पड़ी थी। दादाजी ने मुस्कुराते हुए कबीर से पूछा, “बेटा, क्या तुम्हें लगता है कि यह घड़ी कभी दोबारा चल पाएगी?” कबीर ने निराशा से सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं दादाजी, यह तो पूरी तरह से कबाड़ हो चुकी है। इसका समय अब खत्म हो चुका है।”
सब्र और कोशिश का जादू
दादाजी ने बिना कुछ कहे उस पुरानी घड़ी को खोला। उन्होंने बेहद सावधानी से उसके भीतर जमे मैल को साफ किया, बारीक पुर्जों में थोड़ा सा तेल डाला और एक छोटी सी चाबी लेकर उसके स्प्रिंग को धीरे से घुमा दिया। देखते ही देखते, उस बेजान पड़ी घड़ी के अंदर के चक्र घूमने लगे और सूइयां फिर से ‘टिक-टिक’ की मधुर आवाज के साथ आगे बढ़ने लगीं।
कबीर हैरान होकर यह सब देख रहा था। दादाजी ने कबीर के कंधे पर प्यार से हाथ रखा और बेहद भावुक होकर कहा, “बेटा, यह घड़ी भी तुम्हारी तरह रुक गई थी। बाहर से देखने वालों को लग रहा था कि यह अब बेकार हो चुकी है। लेकिन इसका समय खत्म नहीं हुआ था, बस इसके पुर्जों को थोड़े से धैर्य, सफाई और सही चाबी की जरूरत थी। इंसान का जीवन भी इस घड़ी की तरह ही है। असफलता का मतलब यह नहीं कि तुम्हारी जिंदगी का अंत हो गया है, बल्कि इसका मतलब यह है कि तुम्हें खुद को थोड़ा वक्त देना होगा, अपनी कमियों को सुधारना होगा और हिम्मत की चाबी फिर से भरनी होगी।”
एक नई सुबह की शुरुआत
दादाजी की बातें सीधे कबीर के दिल को छू गईं। उसकी आँखों के आँसू अब सूख चुके थे और उनकी जगह एक नई चमक ने ले ली थी। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में ठहरना लाजमी है, लेकिन हमेशा के लिए हार मान लेना सही नहीं। उसने दादाजी के पैर छुए और एक नए संकल्प के साथ फिर से मेहनत करने के लिए घर वापस लौट आया।
कहानी से सीख (Moral)
सीख: जीवन में असफलताएं केवल एक पड़ाव हैं, पूर्णविराम नहीं। जैसे रुकी हुई घड़ी भी सही कोशिश से दोबारा चल पड़ती है, वैसे ही धैर्य, आत्म-विश्लेषण और निरंतर प्रयास से इंसान अपने थमे हुए जीवन को फिर से सफलता की ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।