सरकारी स्कूलों में ‘कॉकरोच क्रांति’: अब बच्चे नहीं, तिलचट्टे तय करेंगे शिक्षा का स्तर!

काक-वाणी के सभी सुधी पाठकों का तीखा स्वागत है! आज हम देश की उस महान और रेंगने वाली क्रांति पर बात करेंगे, जिसकी गूंज सात समंदर पार जर्मनी के ‘डीडब्ल्यू’ समाचार तक पहुंच गई है। जी हां, हम बात कर रहे हैं सरकारी स्कूलों में चल रहे ‘कॉकरोच आंदोलन’ की। जहां दुनिया के बाकी देश अपने बच्चों को कोडिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिखाने में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, वहीं हमारे दूरदर्शी शिक्षा मंत्रालय ने एक बेहद व्यावहारिक और ‘आत्मनिर्भर’ रास्ता चुना है—बच्चों को प्रकृति के सबसे ढीठ और अमर जीव, यानी कॉकरोच के साथ सह-अस्तित्व सिखाना!

स्मार्ट क्लास नहीं, अब शुरू होगा ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ कोर्स

सरकारी स्कूलों की टूटी दीवारों पर रेंगते और मिड-डे मील की दाल में गोते लगाते ये कॉकरोच दरअसल कोई प्रशासनिक विफलता नहीं हैं। हमारे परम आदरणीय नीति निर्माताओं के अनुसार, यह बच्चों को भविष्य की वैश्विक आपदाओं के लिए तैयार करने का एक उन्नत ‘सर्वाइवल कोर्स’ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि परमाणु हमले के बाद भी सिर्फ कॉकरोच ही जिंदा बच सकते हैं। इसलिए, यदि हमारे बच्चे आज से ही उनके साथ लंच शेयर करना सीख जाएंगे, तो भविष्य के महाविनाश में वे सबसे मजबूत प्रजाति बनकर उभरेंगे। इसे कहते हैं आपदा को अवसर में बदलना!

विपक्ष इस आंदोलन को ‘गंदगी और कुप्रबंधन’ का नाम देकर बदनाम करने की साजिश रच रहा है। लेकिन सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं ने साफ कर दिया है कि यह भोजन में ‘मुफ्त ऑर्गेनिक प्रोटीन’ देने की एक अभिनव सरकारी योजना है। मिड-डे मील के बजट में भले ही फल और दूध गायब हों, लेकिन प्रोटीन से भरपूर ये नन्हे जीव प्लेटों में खुद-ब-खुद चलकर आते हैं। यह देश के गरीब बच्चों को बिना किसी अतिरिक्त बजट के पौष्टिक आहार देने की एक ऐतिहासिक ‘मास्टरस्ट्रोक क्रोनोलॉजी’ है।

कागजी डिजिटल इंडिया और जमीन पर रेंगता सच

स्कूलों के निरीक्षण पर निकलने वाले हमारे आला अफसर भी इन तिलचट्टों को देखकर अपनी आंखें मूंद लेते हैं। आखिर मूंदें भी क्यों न? फाइलों को दबाने और व्यवस्था को कुतरने में जो महारत इन जीवों को हासिल है, वही तो हमारे सरकारी तंत्र का भी असली चरित्र है। दोनों के बीच एक गहरा प्रशासनिक और आध्यात्मिक संबंध है।

हाई-टेक टैबलेट और स्मार्ट बोर्ड की बातें केवल विज्ञापनों और चुनावी भाषणों की शोभा बढ़ाने के लिए होती हैं। धरातल पर तो असली ‘स्मार्टनेस’ ये कॉकरोच ही दिखा रहे हैं, जो बिना किसी वाई-फाई के पूरे स्कूल प्रशासन को अपने इशारों पर नचा रहे हैं। काक-वाणी का मानना है कि अब समय आ गया है जब सरकार को ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की तर्ज पर ‘कॉकरोच बचाओ, स्कूल चलाओ’ का नया नारा बुलंद कर देना चाहिए। आखिरकार, देश का भविष्य सुधरे न सुधरे, इन रेंगने वाले नए ‘शिक्षकों’ का हौसला कभी नहीं टूटना चाहिए!


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कागा जी