वाह! आखिरकार हमारे सरकारी स्कूलों को वह अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल ही गई, जिसके वे सालों से हकदार थे। जर्मन मीडिया ‘DW.com’ ने भारत के सरकारी स्कूलों में चल रहे ‘कॉकरोच आंदोलन’ पर विशेष रिपोर्ट छापी है। अब जलने वाले और विरोधी दल इसे स्वच्छता की कमी या बदइंतजामी कहेंगे, लेकिन ‘काक-वाणी’ इसे एक ऐतिहासिक ‘शैक्षणिक क्रांति’ के रूप में देखती है। आखिर हमारे शिक्षा मंत्रालय की दूरदर्शी नीतियों की बदौलत ही आज स्कूलों में कॉकरोच इतने जागरूक हो चुके हैं कि वे सीधे व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
कॉकरोच: सरकारी स्कूलों के नए और सबसे वफादार ‘शिक्षाविद’
सालों से धूल फांक रही बिना पन्नों वाली किताबों, टूटे हुए ब्लैकबोर्ड और सीलन भरी दीवारों के बीच अगर कोई जीव बिना किसी संडे या त्योहार की छुट्टी के रोज़ स्कूल आता है, तो वह छात्र या शिक्षक नहीं, बल्कि कॉकरोच महोदय हैं। इन्होंने मिड-डे मील के बर्तनों में व्यावहारिक विज्ञान की अपनी पीएचडी पूरी की है। जब सरकारी तंत्र ने बच्चों को ढंग की शिक्षा देने से हाथ खड़े कर दिए, तो इन आत्मनिर्भर कॉकरोचों ने कमान संभाली। वे अब बच्चों को ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ (यानी जो इस गंदगी में टिकेगा, वही देश का भविष्य बनेगा) का लाइव डेमो दे रहे हैं।
शिक्षा मंत्रालय के हमारे सूत्र बताते हैं कि आला अधिकारी इस विदेशी रिपोर्ट से बेहद गदगद हैं। विभाग के एक वरिष्ठ बाबू ने अपनी चाय की प्याली टेबल पर पटकते हुए कहा, “देखिए साहब, बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? कम से कम जर्मन मीडिया हमारे सरकारी स्कूलों की चर्चा तो कर रहा है! वैसे भी, हमारे पास बजट की कमी है, तो हमने बायो-डायवर्सिटी को ही अपना नया सिलेबस बना लिया है।”
‘आत्मनिर्भर’ कॉकरोच बनाम लाचार तंत्र
इस ‘कॉकरोच आंदोलन’ का असली दर्द यह है कि सरकारी स्कूलों में बजट तो आता है, लेकिन वह जमीन पर पहुंचने से पहले ही फाइलों के कीटनाशक से गायब हो जाता है। ऐसे में ये कॉकरोच ही हैं जो बिना किसी सरकारी वेतन या पेंशन के, स्कूलों की रौनक बढ़ाए हुए हैं। ये आंदोलनकारी कॉकरोच सरकार से मांग कर रहे हैं कि स्कूलों में बचे-खुचे झाड़ू-पोछे के काम को भी तुरंत रोका जाए, ताकि उनका ‘प्राकृतिक आवास’ सुरक्षित रह सके।
‘काक-वाणी’ का मानना है कि सरकार को अब ज्यादा देर नहीं करनी चाहिए। जब देश के छात्र और शिक्षक व्यवस्था से हारकर चुप बैठ गए हैं, तो इन रेंगने वाले कीटों को ही स्कूलों का ‘ब्रांड एंबेसडर’ घोषित कर देना चाहिए। कम से कम वे रोज़ स्कूल तो आते हैं!</p
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